Gaon Ki Chudakkad Bhabhi

भाभी की साड़ी व पेटीकोट को ऊपर की तरफ खिसका रहा था

नमस्कार दोस्तो, मैं महेश कुमार सरकारी नौकरी करता हूँ। मैं आपको पहले भी बता चुका हूँ कि मेरी सभी कहानियाँ काल्पनिक हैं.. जिनका किसी से भी कोई सम्बन्ध नहीं है.. अगर होता भी है तो ये मात्र संयोग ही होगा Gaon Ki Chudakkad Bhabhi।

मेरी पहले की कहानियों में आपने मेरे बारे में जान ही लिया होगा। अब मैं उसके आगे का एक वाकिया लिख रहा हूँ उम्मीद करता हूँ कि ये आपको पसन्द आएगा। चलो अब कहानी का मजा लेते हैं।

मेरी परीक्षाएं समाप्त हुए हफ्ता भर ही हुआ था कि मेरे भैया दो महीने की छुट्टी आ गए जिसके कारण मुझे ड्राईंगरूम में सोना पड़ा।

मैंने सोचा था कि परीक्षाएं समाप्त होने के बाद पायल भाभी के साथ खुल कर मजे करूंगा.. मगर भैया के छुट्टी पर घर आ जाने के कारण मेरे सारे ख्वाब अधूरे रह गए, मेरे दिन बड़ी मुश्किल से गुजर रहे थे, भैया को भाभी के कमरे में सोते देखकर, मैं बस जलता रहता था और वैसे भी मैं क्या कर सकता था, आखिरकार वो उनकी बीवी है।

बस इसी तरह दिन गुजर रहे थे कि एक दिन पापा ने मुझे बताया कि गाँव से रामेसर चाचा जी काफी बार फोन कर चुके हैं, वो मुझे गाँव बुला रहे हैं।

पापा ने बताया कि फसल की कटाई होने वाली है और गाँव के मकान की हालत देखे भी काफी दिन हो गए हैं इसलिए छुट्टियों में मैं कुछ दिन गाँव चला जाऊँ।

रामेसर चाचा मेरे सगे चाचा नहीं हैं.. वो गाँव में हमारे पड़ोसी हैं जिसके कारण उनसे हमारे काफी अच्छे सम्बन्ध हैं। मेरे पापा की शहर में नौकरी लग गई थी इसलिए हम सब शहर में रहने लग गए थे। गाँव में हमारा एक पुराना मकान और कुछ खेत हैं। घर में तो कोई नहीं रहता है.. पर खेतों में रामेसर चाचा खेती करते हैं, फसल के तीन हिस्से वो खुद रख लेते हैं.. एक चौथाई हिस्सा हमें दे देते हैं।

गाँव में मेरा दिल तो नहीं लगता है.. मगर यहाँ रहकर जलने से अच्छा तो मुझे गाँव जाना ही सही लगा, इसलिए मैं गाँव जाने के लिए मान गया और अगले ही दिन गाँव चला गया।

गाँव में जाने पर चाचाजी के सभी घर वाले बड़े खुश हो गए। चाचाजी के घर में चाचा-चाची, उनकी लड़की सुमन, रेखा भाभी व उनका छः साल का लड़का सोनू है।

रेखा भाभी विधवा हैं उनके पति विनोद भैया का दो साल पहले ही खेत में पानी लगाते समय साँप काटने के कारण स्वर्गवास हो गया था।

मैं देर शाम से गाँव पहुंचा था इसलिए कुछ देर सभी से बातें करते-करते ही खाने का समय हो गया। वैसे भी गाँव में सब लोग जल्दी खाना खा कर.. जल्दी ही सो जाते हैं और सुबह जल्दी उठ भी जाते हैं।

खाना खाने के बाद सब सोने की तैयारी करने लगे।

गर्मियों के दिन थे और गर्मियों के दिनों में गाँव के लोग अधिकतर बाहर ही सोते हैं इसलिए मेरी चारपाई भी चाचाजी के पास घर के आँगन में ही लगा दी गई।

वैसे तो उनका घर काफी बड़ा है.. जिसमें चार कमरे और बड़ा सा आँगन है, मगर इस्तेमाल में वो दो ही कमरे लाते हैं। जिसमें से एक कमरे में चाची व सोनू सो गए और दूसरे कमरे में सुमन व रेखा भाभी सो गए। बाकी के कमरों में अनाज, खेती व भैंस का चारा आदि रखा हुआ था।

खैर.. कुछ देर चाचाजी मुझसे बातें करते रहे और फिर सो गए। मुझे नींद नहीं आ रही थी.. क्योंकि जहाँ हम सो रहे थे.. भैंस भी वहीं पर बँधी हुई थी, जिसके गोबर व मूत्र से बहुत बदबू आ रही थी, साथ ही वहाँ पर मच्छर भी काफी थे।

मैं रात भर करवट बदलता रहा.. मगर मुझे नींद नहीं आई। सुबह पाँच बजे जब चाची जी भैंस का दूध निकालने के लिए उठीं.. तब भी मैं जाग ही रहा था।

मैंने चाची को जब ये बताया तो वो हँसने लगीं और उन्होंने कहा- तुम्हें रात को ही बता देना चाहिये था, तुम‌ यहाँ पर नए हो ना.. इसलिए तुम्हें आदत नहीं है, कल से तुम रेखा व सुमन के कमरे में सो जाना। वो दोनों उठ गई हैं.. तुम अभी उनके कमरे में जाकर सो जाओ।

मगर मैंने मना कर दिया और तैयार होकर चाचा-चाची के साथ खेतों में चला गया। रेखा भाभी के लड़के सोनू को भी हम साथ में ले आए। सुमन की परीक्षाएं चल रही थीं इसलिए वो कॉलेज चली गई।

रेखा भाभी को खाना बनाना और घर व भैंस के काम करने होते हैं.. इसलिए वो घर पर ही रहीं।

फसल की कटाई चल रही थी.. इसलिए चाचा-चाची तो उसमें लग गए.. मगर मुझे कुछ करना तो आता नहीं था इसलिए मैं सोनू के साथ खेलता रहा और ऐसे ही खेतों में घूमता रहा।

सभी के लिए दोपहर का खाना रेखा भाभी को लेकर आना था। मगर मैं ऐसे ही फ़ालतू घूम रहा था, इसलिए मैंने चाची जी से कहा- दोपहर का खाना मैं ले आता हूँ। इस पर चाचाजी ने भी हामी भरकर कहा- ठीक है.. ऐसे भी रेखा को घर पर बहुत काम होते हैं।

करीब दस बजे मैं दोपहर का खाना लेने के लिए घर चला गया। जब मैं घर पर पहुँचा तो देखा कि घर पर कोई नहीं है। मैंने सोचा कि रेखा भाभी यहीं कहीं पड़ोस के घर में गई होंगी.. इसलिए मैं भाभी के कमरे में जाकर बैठ गया और उनके आने का इन्तजार करने लगा।

मुझे कुछ देर ही हुई थी कि तभी रेखा भाभी दौड़ती हुई सी सीधे कमरे में आईं।

अचानक ऐसे रेखा भाभी के आने से एक बार तो मैं भी घबरा गया मगर जब मेरा ध्यान रेखा भाभी के कपड़ों की तरफ गया तो बस मैं उन्हें देखता ही रह गया। क्योंकि रेखा भाभी मात्र ब्रा व एक पेटीकोट में मेरे सामने खड़ी थीं।

रेखा भाभी नहाकर आई थीं.. इसलिए भाभी ने नीचे बस काले रंग का पेटीकोट व ऊपर सफेद रंग की केवल एक ब्रा पहन रखी थी। भाभी ने अपने सिर के गीले बालों को तौलिए से बाँध रखा था। उन कपड़ों में रेखा भाभी का संगमरमर सा सफेद शरीर.. ना के बराबर ढका हुआ था।

मुझे देखते ही भाभी दरवाजे पर ही ठिठक कर रूक गईं क्योंकि उन्हें अन्दाजा भी नहीं था कि कमरे में मैं बैठा हो सकता हूँ। मुझे देखकर रेखा भाभी इतनी घबरा गईं कि कुछ देर तक तो सोच भी नहीं पाईं.. कि वो अब क्या करें। भाभी वहीं पर बुत सी बनकर खड़ी हो गईं, उम्म्ह… अहह… हय… याह… तब तक मैं भाभी के रूप को आँखों से पीता रहा।

फिर रेखा भाभी जल्दी से पलट कर दूसरे कमरे में चली गईं। भाभी के दूसरे कमरे में चले जाने के बाद भी मैं भाभी के रूप में ही खोया रहा।

सच में रेखा भाभी इस रूप में कयामत लग रही थीं.. ऐसा लगता था कि भाभी को ऊपर वाले ने बड़ी ही फुर्सत से बनाया होगा।

भाभी का गोल चेहरा.. काली व बड़ी-बड़ी आँखें, पतले सुर्ख गुलाबी होंठ, लम्बा व छरहरा शरीर, बस एक बड़े सन्तरे से कुछ ही बड़े आकार की उन्नत व सख्त गोलाइयां और भरे हुए माँसल नितम्ब.. आह्ह.. उनको देखकर कोई कह नहीं सकता था कि वो छः साल के बच्चे की माँ भी हो सकती हैं।

कुछ देर बाद रेखा भाभी कपड़े पहन कर फिर से कमरे में आईं और उन्होंने मुझसे पूछा- तुम कब आए? भाभी मुझसे आँखें नहीं मिला रही थीं क्योंकि रेखा भाभी बहुत ही शरीफ व भोली हैं.. ऊपर से वो विधवा भी हैं।

मैंने भी भाभी से आँखें मिलाने की कोशिश नहीं की.. ऐसे ही उन्हें अपने आने का कारण बता दिया।

रेखा भाभी ने जल्दी ही मुझे खाना बाँध कर दे दिया और मैं भी बिना कुछ कहे चुपचाप खाना लेकर खेतों के लिए चल पड़ा। मैं रास्ते भर भाभी के बारे में ही सोचता रहा।

रेखा भाभी के बारे में पहले मेरे विचार गन्दे नहीं थे.. मगर भाभी का रूप देखकर मेरी नियत खराब हो रही थी, मेरे दिल में हवश का शैतान जाग गया था, मैं सोच रहा था कि विनोद भैया का देहान्त हुए दो साल हो गए है इसलिए रेखा भाभी का भी दिल तो करता ही होगा। यह हिंदी चुदाई की कहानी आप अन्तर्वासना सेक्स स्टोरीज डॉट कॉम पर पढ़ रहे हैं!

खेत में भी मैं रेखा भाभी के बारे में ही सोचता रहा और दिल ही दिल में उन्हें पाने के लिए योजना बनाने में लग गया।

शाम को मैं चाचा-चाची के साथ ही खेत से वापस आया, घर आकर खाना खाया और फिर सभी सोने की तैयारी करने लगे। चाची ने मेरी चारपाई रेखा भाभी व सुमन दीदी के कमरे में लगवा दी थी और साथ ही मेरी चारपाई के नीचे मच्छर भगाने की अगरबत्ती भी जला दी।

उस कमरे में एक डबलबैड था.. जिस पर सुमन व रेखा भाभी सोते थे और साथ ही कुर्सियां टेबल, अल्मारी व कुछ अन्य सामान होने के कारण ज्यादा जगह नहीं थी.. इसलिए मेरी चारपाई बेड के बिल्कुल साथ ही लगी हुई थी।

सुमन की परीक्षाएं चल रही थीं.. इसलिए खाना खाते ही वो पढ़ाई करने लगी। रेखा भाभी घर के काम निपटा रही थीं.. इसलिए वो थोड़ा देर से कमरे में आईं और आकर चुपचाप सो गईं।

मैंने उनसे बात करने की कोशिश की.. मगर उन्होंने बात करने के लिए मना कर दिया क्योंकि सुमन भी वहीं पढ़ाई कर रही थी। कुछ देर पढ़ाई करने के बाद सुमन भी सो गई।

दीवार के किनारे की तरफ सुमन थी और मेरी चारपाई की तरफ रेखा भाभी सो रही थीं। वो मेरे इतने पास थीं कि मैं चारपाई से ही हाथ बढ़ाकर उन्हें आसानी से छू सकता था। लेकिन यह बहुत ही खतरनाक हो सकता था। जब तक भाभी की तरफ से मुझे कोई सिग्नल नहीं मिलता.. कुछ भी करना मतलब अपनी इज्जत का फालूदा करवाना हो सकता था।

मगर मेरे दिमाग में तय ही चुका था कि भाभी की जवान चूत को तो चोदना ही है।

Gaon Ki Chudakkad Bhabhi

रेखा भाभी के इतने पास होने के कारण मेरे दिल में एक अजीब गुदगुदी सी हो रही थी.. मगर कुछ करने कि मुझमें हिम्मत नहीं थी। मैं पिछली रात को ठीक से नहीं सोया था इसलिए पता नहीं कब मुझे नींद आ गई और सुबह भी मैं देर तक सोता रहा।

सुबह जब रेखा भाभी कमरे की सफाई करने के लिए आईं तो उन्होंने ही मुझे जगाया। मैं उठा.. तब तक चाचा-चाची खेत में जा चुके थे और सुमन भी कॉलेज चली गई थी।

घर में बस मैं और रेखा भाभी ही थे.. मेरा दिल तो कर रहा था कि रेखा भाभी को पकड़ लूँ.. मगर इतनी हिम्मत मुझमें कहाँ थी। इसलिए मैं उठकर जल्दी से खेत में जाने के लिए तैयार हो गया।

मैं काफी देर से उठा था तब तक दोपहर के खाने का भी समय हो गया था.. इसलिए खेत में जाते समय रेखा भाभी ने मुझे दोपहर का खाना भी बनाकर दे दिया।

इसके बाद खेत से मैं शाम को चाचा चाची के साथ ही घर वापस आया।

सुबह मैं देर से उठता था इसलिए रोजाना की मेरी यही दिनचर्या बन गई कि मैं दोपहर का खाना लेकर ही खेत में जाता और शाम को चाचा चाची के साथ ही खेत से वापस आता। मगर जब भी घर में रहता तो किसी ना किसी बहाने से रेखा भाभी के ज्यादा से ज्यादा पास रहने की कोशिश करता रहता और रेखा भाभी को पटाने की कुछ ना कुछ तरकीब बनाता रहता।

मगर रेखा भाभी ने मुझमे कोई रूचि नहीं दिखाई और भाभी के प्रति मेरी वासना बढ़ती ही जा रही थी।

एक सुबह नींद खुलने के बाद भी मैं ऐसे ही चारपाई पर लेटा हुआ ऊंघ रहा था कि तभी मेरे दिमाग में एक योजना आई। मुझे पता था कि रेखा भाभी मुझे जगाने के लिए नहीं.. तो कमरे में सफाई करने के लिए तो जरूर ही आएंगी और घर में मेरे व रेखा भाभी के अलावा कोई है भी नहीं, इसलिए मुझे इस वक्त किसी का डर भी नहीं था।

सुबह-सुबह पेशाब के ज्वर के कारण मेरा लिंग उत्तेजित तो था ही.. ऊपर से रेखा भाभी के बारे में सोचने पर मेरा लिंग बिल्कुल लोहे सा सख्त हो गया।

मैंने अपने अण्डरवियर व पायजामे को थोड़ा सा नीचे खिसका कर अपने लिंग को बाहर निकाल लिया और इस तरह से व्यवस्थित कर लिया कि रेखा भाभी जब कमरे में आएं.. तो उन्हें मेरा उत्तेजित लिंग आसानी से नजर आ जाए। फिर मैं सोने का बहाना करके भाभी के कमरे में आने का इन्तजार करने लगा।

मुझे ज्यादा इन्तजार नहीं करना पड़ा क्योंकि कुछ देर बाद ही रेखा भाभी कमरे में आ गईं।
भाभी के आते ही मैं जल्दी से आँखें बन्द करके सोने का नाटक करने लगा। भाभी मुझे जगाने के लिए मेरी चारपाई की तरफ बढ़ ही रही थीं कि वो वहीं पर रुक गईं और फिर जल्दी से वापस बाहर चली गईं।

मैं सोच रहा था कि रेखा भाभी मेरे उत्तेजित लिंग को देखकर शायद खुद ही मेरे पास आ जाएं.. मगर ऐसा कुछ तो नहीं हुआ। ऊपर से रेखा भाभी के ऐसे चले जाने के कारण मुझे डर लगने लगा कि कहीं भाभी मेरी शिकायत ना कर दें।

रेखा भाभी के जाने के बाद मैं काफी देर तक ऐसे ही लेटा रहा क्योंकि मैं चाहता था कि भाभी को ऐसा लगे कि मैं सही में ही सो रहा हूँ। मगर भाभी को शायद शक हो गया था कि मैंने जानबूझ कर ऐसा किया है क्योंकि जब तक मैं खुद ही उठकर बाहर नहीं गया तब तक भाभी दोबारा कमरे में नहीं आईं और ना ही मुझे जगाने की कोशिश की।

जब मैं खुद ही उठकर बाहर गया तब भी रेखा भाभी मुझसे ठीक से बात नहीं कर रही थीं.. इसलिए मैं खेत में जाने के लिए तैयार हो गया और इस दौरान भाभी ने मुझसे बस एक-दो बार ही बात की होगी।

इसके बाद रोजाना की तरह ही मैं दोपहर का खाना लेकर खेत में चला गया और शाम को चाचा चाची के साथ ही घर वापस आया।

शाम को जब मैं घर आया तो मुझे डर लग रहा था कि कहीं रेखा भाभी सुबह वाली बात चाचा-चाची को ना बता दें मगर उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया।

इसके बाद तो मेरी भी दोबारा ऐसी कुछ हरकत करने की कभी हिम्मत नहीं हुई। अब रेखा भाभी को पता चल गया था कि मेरी नियत उनके प्रति क्या है.. इसलिए उन्होंने मुझसे बातें करना बहुत ही कम कर दिया और मुझसे दूर ही रहने की कोशिश करने लगीं।
सुबह भी जब तक मैं सोता रहता.. तब तक वो कमरे में नहीं आती थीं।

इसी तरह हफ्ता भर गुजर गया और इस हफ्ते भर में मैंने रेखा भाभी को याद करके काफी बार हस्तमैथुन किया.. मगर उनके साथ कुछ करने की मैं हिम्मत नहीं कर सका।

एक बार रात को सोते हुए ऐसे ही मेरी नींद खुल गई। मैंने सोचा कि सुबह हो गई.. मगर जब मैंने बाहर देखा तो बाहर बिल्कुल अन्धेरा था। फिर मैंने रेखा भाभी व सुमन की तरफ देखा, वो दोनों सो रही थीं।

मगर जब मेरा ध्यान रेखा भाभी पर गया तो मेरी आँखें खुली की खुली रह गईं, क्योंकि रेखा भाभी के कपड़े अस्त-व्यस्त थे। उनकी साड़ी व पेटीकोट उनके घुटनों के ऊपर तक हो रखे थे।

कमरे में अन्धेरा था। बस खिड़की से चाँद की थोड़ी सी रोशनी आ रही थी.. जिसमें रेखा भाभी के संगमरमर सी सफेद गोरी पिण्डलियाँ ऐसे दमक रही थीं जैसे कि उन्हीं में से ही रोशनी फूट रही हो।

भाभी के घुटनों तक के दूधिया सफेद नंगे पैरों को देखकर मेरा लिंग अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गया और मेरे लिए अपने आप पर काबू पाना मुश्किल हो गया।

मुझे डर लग रहा था मगर फिर भी मैं अपने आपको रोक नहीं सका और धीरे से अपना एक हाथ रेखा भाभी के नंगे घुटने पर रख दिया और कुछ देर तक मैं बिना कोई हरकत किए ऐसे ही लेटा रहा, ताकि अगर रेखा भाभी जाग भी जाएं तो उन्हें लगे कि मैं नींद में हूँ।

कुछ देर इन्तजार करने के बाद जब रेखा भाभी ने कोई हरकत नहीं की तो मैं धीरे-धीरे अपने हाथ को रेखा भाभी की जाँघों की तरफ बढ़ाने लगा।

मैं रेखा भाभी की जाँघों की तरफ बढ़ते हुए धीरे-धीरे उनकी साड़ी व पेटीकोट को भी ऊपर की तरफ खिसका रहा था। जितना मेरा हाथ ऊपर की तरफ बढ़ता रेखा भाभी की संगमरमरी सफेद जाँघें भी उतनी ही नंगी हो रही थीं।

जैसे-जैसे भाभी की जांघें नंगी हो रही थीं.. वैसे वैसे ही मानो कमरे में उजाला सा हो रहा था। क्योंकि उनकी जाँघें इतनी गोरी थीं कि अन्धेरे में भी दमक रही थीं।

धीरे-धीरे मेरा हाथ रेखा भाभी के घुटने पर से होता हुआ उनकी मखमल सी नर्म मुलायम माँसल व भरी हुई जाँघों पर पहुँच गया जो कि इतनी नर्म मुलायम व चिकनी थी कि अपने आप ही मेरा हाथ फिसल रहा था।

मेरा हाथ रेखा भाभी के घुटने पर से होता हुआ उनकी जाँघों पर पहुँच गया था.. मगर रेखा भाभी की तरफ से कोई हरकत नहीं हो रही थी, शायद वो गहरी नींद में थीं।

इससे मेरी थोड़ी हिम्मत बढ़ गई और मैं अपने हाथ को रेखा भाभी की दोनों जाँघों के बीच धीरे-धीरे अन्दर की तरफ ऊपर बढ़ाने लगा।

थोड़ा सा ऊपर बढ़ते ही डर व घबराहट के कारण मेरा पूरा शरीर काँपने लगा। क्योंकि अब मेरा हाथ रेखा भाभी के जाँघों के जोड़ पर पहुँच गया था। उन्होंने साड़ी व पेटीकोट के नीचे पेंटी पहन रखी थी।

अन्धेरे के कारण मैं ये तो नहीं देख पा रहा था कि उनकी पेंटी कैसे रंग की है.. मगर हाँ वो जरूर किसी गहरे रंग की थी। मैंने धीरे से, बहुत ही धीरे से हाथ को उनकी पेंटी के ऊपर रख दिया और पेंटी के ऊपर से ही उनकी योनि का मुआयना करने लगा।
उनकी योनि बालों से भरी हुई थी जो कि पेंटी के ऊपर से ही मुझे महसूस हो रहे थे।

मैं धीरे-धीरे उनकी योनि को सहला ही रहा था कि तभी अचानक से रेखा भाभी जाग गईं.. उन्होंने मेरा हाथ झटक कर दूर कर दिया और जल्दी से उठकर अपनी साड़ी व पेटीकोट को सही करने लगीं।

ये सभी काम उन्होंने एक साथ और बिजली की सी रफ्तार से किए। डर के मारे मेरी तो साँस ही अटक गई, मैं जल्दी से सोने का नाटक करने लगा मगर भाभी को पता चल गया था कि मैं जाग रहा हूँ।

मैंने थोड़ी सी आँख खोलकर देखा तो रेखा भाभी अपने कपड़े सही करके बैठी हुई थीं और मेरी ही तरफ देख रही थीं।

मैं डर रहा था कि कहीं रेखा भाभी शोर मचाकर सबको बता ना दें। डर के मारे मेरा दिल इतनी जोरों से धड़क रहा था कि मैं खुद ही अपने दिल की धड़कन सुन पा रहा था। मगर फिर कुछ देर बाद रेखा भाभी सुमन की तरफ करवट बदल कर फिर से सो गईं।

मैं सोने का नाटक कर रहा था मगर मुझे नींद नहीं आ रही थी। अभी जो कुछ हुआ मैं उसी के बारे में सोच रहा था।

मैं सोच रहा था कि अगर रेखा भाभी को शोर मचाना होता और मेरी शिकायत करनी होती तो अभी तक वो कर देतीं। शायद वो भी बदनामी से डर रही हैं और वैसे भी रेखा भाभी बहुत शरीफ हैं। शायद इसलिए उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया। ये बात मेरे दिमाग में आते ही मुझमें हिम्मत आ गई और एक बार फिर मैंने धीरे से रेखा भाभी की जाँघ पर हाथ रख दिया।

मगर रेखा भाभी को नींद नहीं आई थी इसलिए उन्होंने तुरन्त मेरा हाथ झटक कर दूर कर दिया और चादर ओढ़ लिया और सुमन के और पास को खिसक गईं।

अब तो मुझे यकीन हो गया था कि रेखा भाभी डर रही हैं इसलिए किसी से कुछ नहीं कहेंगी। मैंने उनके इसी डर का फायदा उठाने की सोचा, इससे मुझमें फिर हिम्मत आ गई।
मैं सोने का नाटक करके रेखा भाभी को नींद आने का इन्तजार करने लगा। करीब आधे-पौने घण्टे तक मैं ऐसे ही इन्तजार करता रहा और जब मुझे लगा कि रेखा भाभी गहरी नींद सो गई हैं.. तो मैंने धीरे से उनकी तरफ फिर अपना हाथ बढ़ा दिया।

मगर अब वो मेरे हाथ की पहुँच से बाहर थीं। रेखा भाभी सुमन के बिल्कुल पास होकर सो रही थीं.. जिस कारण लेटे-लेटे मेरा हाथ उन तक नहीं पहुँच पा रहा था।

जब लेटे-लेटे मेरा हाथ रेखा भाभी तक नहीं पहुँचा, तो मैंने धीरे से खिसक कर अपने आधे शरीर को उनके बेड पर कर लिया। अब धीरे, बिल्कुल ही धीरे से पहले तो उनके पैरों की तरफ से चादर को हटा दिया। फिर धीरे-धीरे उनकी साड़ी व पेटीकोट में हाथ डालकर ऊपर खिसकाने लगा।

मैं रेखा भाभी की साड़ी व पेटीकोट को उनके जाँघों तक ही ऊपर कर सका क्योंकि इसके ऊपर वो उनके कूल्हों के नीचे दबे हुए थे।

साड़ी व पेटीकोट को ऊपर करने के लिए मैंने उन्हें थोड़ा सा खींचा ही था कि तभी रेखा भाभी की नींद खुल गई, वो फिर से उठकर बैठ गई और जल्दी से मुझे हटाने लगीं।

मगर अब मैं कहाँ हटने वाला था, मैं दोनों हाथों को रेखा भाभी की जाँघों के नीचे से डालकर उनकी गोरी चिकनी जाँघों से लिपट गया। मैंने उनकी साड़ी व पेटीकोट में सर डालकर उनकी नंगी जाँघों पर चुम्बनों की झड़ी लगा दी।

मुझसे बचने के लिए रेखा भाभी अपने घुटने मोड़ना चाह रही थीं.. मगर मेरे शरीर का भार उनके पैरों पर था.. इसलिए वो ऐसा नहीं कर सकीं।

मैं रेखा भाभी की जाँघों को चूमते हुए धीरे-धीरे ऊपर उनकी पेंटी तक पहुँच गया जहाँ से उनकी योनि से मादक गंध फूट रही थी। मैं भाभी की पेंटी के ऊपर से ही उनकी योनि को चूमने लगा।

मैं रेखा भाभी की पेंटी को चूमते हुए उनके कूल्हों के नीचे से साड़ी व पेटीकोट में हाथ डालकर उनकी पेंटी को भी निकालने कोशिश कर रहा था।

मगर तभी रेखा भाभी ने मेरे बालों को पकड़ लिया और मेरे बालों को खींचकर मुझे हटाने की कोशिश करने लगीं। बाल खिंचने से मुझे दर्द होने लगा.. इसलिए मैं पीछे हटने लगा। मगर मेरे हाथ रेखा भाभी की पेंटी को पकड़े हुए थे इसलिए मेरे पीछे हटने के साथ-साथ उनकी पेंटी भी उतरने लगी।

रेखा भाभी एक साथ एक ही काम कर सकती थी या तो वो अपनी पेंटी को पकड़ लेतीं या फिर मेरे बालों को। वो मेरे बालों को छोड़कर जब तक अपनी पेंटी को पकड़तीं.. तब तक उनकी पेंटी जाँघों तक उतर चुकी थी।

रेखा भाभी उसे दोबारा ऊपर करें.. उससे पहले ही मैं उनकी जाँघों से चिपक गया और अपने सर को फिर से उनकी साड़ी व पेटीकोट में डालकर दोनों जाँघों के बीच घुसा दिया।

मैं फिर से रेखा भाभी की जाँघों को चूमने-चाटने लगा और साथ ही धीरे-धीरे जाँघों को चूमते हुए उनकी योनि की तरफ बढ़ने लगा।

रेखा भाभी का पूरा शरीर डर के मारे काँप रहा था, वो बार-बार सुमन की तरफ देख रही थीं कि कहीं वो न जाग जाए।
भाभी मुझे हटाने के लिए अपनी पूरी ताकत भी लगा रही थीं।

डर तो मुझे भी लग रहा था.. मगर एक तो सुमन दीवार की तरफ करवट करके सो रही थी और दूसरा इतना कुछ होने के बाद मैं पीछे हटना नहीं चाहता था। इसलिए मैं रेखा भाभी की दोनों जाँघों को बांहों में भर कर उनसे चिपटा रहा।

रेखा भाभी भी विवश सी हो गई थीं, वो ना तो शोर मचा सकती थीं और ना ही मुझे हटा पा रही थीं।
मैं भी अब तक रेखा भाभी की योनि के ऊपर पहुँच गया था.. जो कि अब नंगी थी। मगर उन्होंने अपनी दोनों जाँघों को भींच रखा था और दूसरा उनके बैठे होने के कारण मेरा मुँह उनकी योनि से दूर था इसलिए मैं उनकी जाँघों के जोड़ पर व योनि के ऊपरी भाग को ही अपनी जीभ व होंठों से सहलाने लगा। इसके साथ ही मैं दोनों हाथों से उनकी जाँघों को अन्दर की तरफ से सहला भी रहा था।

इस दोहरे हमले का जो असर होना था.. वही हुआ और कुछ ही देर में इसका असर रेखा भाभी पर भी दिखने लगा। उनकी जाँघों की पकड़ ढीली पड़ने लगी। मैं इसी मौके की तलाश में था।

मैंने धीरे धीरे रेखा भाभी की पेंटी को नीचे खिसका कर उसे उतार दिया और फिर दोनों हाथों को उनकी जाँघों के बीच में डालकर उन्हें थोड़ा सा फैला दिया।
रेखा भाभी को शायद इस बात का अहसास हो गया था इसलिए उन्होंने फिर से अपनी टाँगों को सिकोड़ने की कोशिश की.. लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

मैंने दोनों हाथों से जोर लगा उनकी दोनों जाँघों को फैला दिया और जल्दी से अपना सर उनकी दोनों जाँघों के बीच घुसा दिया।

अब मेरा सर रेखा भाभी की जाँघों के बीच घुस चुका था और मेरा मुँह उनकी योनि के ठीक ऊपर था।

मैंने जल्दी से अपने प्यासे होंठ रेखा भाभी की बालों से भरी योनि पर रख दिए।

अपनी योनि पर मेरे होंठों का स्पर्श पाते ही एक बार तो रेखा भाभी भी सिहर सी उठीं.. मगर फिर वो मुझे हटाने के लिए फिर से धक्के मारने लगीं।
पर अब मैं कहाँ रूकने वाला था, मैं उनकी जाँघों को पकड़ कर उनसे चिपटा रहा और धीरे धीरे भाभी की योनि को चूमता रहा।

कुछ पलों बाद रेखा भाभी का विरोध भी अब हल्का पड़ने लगा। मैं रेखा भाभी की योनि की दोनों फाँकों के अन्दर की तरफ चूम रहा था.. साथ ही योनि की फांकों को चूमते हुए होंठों से ही धीरे-धीरे योनि के अनारदाने को भी तलाश कर रहा था।

मगर थोड़ा सा नीचे बढ़ते ही मुझे कुछ गीलापन सा महसूस हुआ। इसका मतलब था कि रेखा भाभी को भी मजा आ रहा है.. इसलिए मैं रेखा भाभी की योनि को चूमते हुए धीरे-धीरे नीचे उनके प्रेम द्वार‌ की तरफ बढ़ने लगा।

रेखा भाभी के बैठे होने के कारण योनिद्वार नीचे दबा हुआ था.. इसलिए मैं उनके प्रेम‌द्वार तक नहीं पहुँच सका।

फिर भी रेखा भाभी के योनिरस को चखने के लिए मैंने धीरे से प्रेमरस से भीगे बालों को ही चाट लिया, जो कि बड़ा ही नमकीन व कसैला स्वाद युक्त था।

रेखा भाभी की योनि पर मेरी जीभ के लगते ही उनके मुँह से ना चाहते हुए भी एक हल्की सी सीत्कार फूट पड़ी और मेरी जीभ से बचने के लिए उन्होंने अपने दोनों हाथों का सहारा लेकर कूल्हों को हवा में ऊपर उठा लिया।

मैंने एक बार बस रेखा भाभी की योनि से रिसते हुए प्रेमरस को चखा और फिर वापस अपनी जीभ को ऊपर की तरफ ले जाकर योनि के अनारदाने को तलाश करने लगा।

मगर उनकी योनि इतने घने गहरे बालों से भरी हुई थी कि वो मेरे मुँह में आ रहे थे। शायद कई महीनों से रेखा भाभी ने उन्हें साफ नहीं किया था। इसलिए मैंने रेखा भाभी की जाँघों को छोड़ दिया और दोनों हाथों की उंगलियों से उनकी काम सुरंग के बाहर, दोनों फांकों को फैला दिया। अब मैंने फिर से अपनी जुबान को रेखा भाभी की योनि पर रख दिया।

अब की बार मेरी जुबान ने सीधा रेखा भाभी के अनारदाने को स्पर्श किया था इसलिए एक बार फिर उनके मुँह से हल्की सी सीत्कार फूट पड़ी।

इसी के साथ भाभी ने अपने कूल्हों को ऊपर हवा में उठा लिया। अब रेखा भाभी भी उत्तेजित हो गई थीं इसलिए उन्होंने मेरा विरोध करना बन्द कर दिया और मेरे हल्का सा धकेलते ही वो फिर से बैड पर लेट गईं।

रेखा भाभी अब पूरी तरह से मेरे वश में थी इसलिए मैं रेखा भाभी को अपनी चारपाई पर ले जाने के लिए धीरे-धीरे उन्हें अपनी तरफ खींचने लगा।
रेखा भाभी खिसक कर थोड़ा सा मेरी तरफ आईं.. मगर फिर रूक गईं। शायद उन्हें अहसास हो गया था कि मैं उन्हें चारपाई पर ले जाकर क्या करना चाहता हूँ।

सुमन के होते हुए शायद रेखा भाभी मुझे कुछ करने भी नहीं देंगी.. इसलिए मैंने सोचा कि जो मिल रहा है उसी से काम चला लिया जाए।
अब फिर से मैंने उनकी योनि पर अपने होंठ रख दिए, साथ ही दोनों हाथों से धीरे-धीरे उनके उरोजों को भी सहलाने लगा।

रेखा भाभी अब भी बार-बार सुमन की तरफ देख रही थीं। तभी उन्होंने जो चादर ओढ़ रखी थी उसे सही से करके ओढ़ लिया। मगर भाभी ने मुझे हटाने और अपने कपड़े सही करने की कोशिश नहीं की, बल्कि मुझ पर भी वही चादर डालकर मुझे उस चादर से छुपा लिया।

रेखा भाभी तक पहुँचने के लिए मेरा आधा शरीर बेड पर था और मेरे पैर चारपाई पर लटक रहे थे।

मैं और रेखा भाभी अग्रेजी के अक्षर टी (T) की तरह हो रखे थे.. जिस कारण मुझे रेखा भाभी की योनि तक पहुँचने में थोड़ी दिक्कत हो रही थी।

मैं रेखा भाभी का एक पैर उठाना चाहता था.. मगर तभी रेखा भाभी ने सुमन की तरफ करवट बदल ली और अपने घुटने मोड़ लिए।

अब रेखा भाभी के कूल्हे मेरी तरफ हो गए थे.. इसलिए मैं उनके नंगे कूल्हों को ही चूमने लगा। फिर धीरे से मैंने भाभी की एक जाँघ को उठाकर उसके नीचे से उनकी दोनों जाँघों के बीच अपना सर डाल दिया.. जिसका उन्होंने कोई विरोध नहीं किया।

अब तो मेरे लिए और भी अच्छा हो गया था क्योंकि अब मेरा मुँह रेखा भाभी की दोनों जाँघों के बीच बिल्कुल योनिद्वार पर ही पहुँच गया था। शायद रेखा भाभी ने जानबूझ कर मेरी सहूलियत के लिए ही ऐसा किया था। इसलिए मैंने भी रेखा भाभी की गीली योनि को जोरों से प्यार से चूम लिया, जिससे रेखा भाभी एक बार फिर से सिहर उठीं।

मगर इस बार उन्होंने खुद ही अपना घुटना मोड़कर मेरे कंधे पर रख दिया.. जिससे उनकी दोनों जाँघें अपने आप खुल गईं।

अब मैं भी धीरे-धीरे रेखा भाभी की योनि को चूमने-चाटने लगा.. मगर उनकी योनि के बाल मेरे मुँह में आ रहे थे। इसलिए मैं अपने दोनों हाथों को भी रेखा भाभी की जाँघों के बीच में ले आया, मैंने अपनी उंगलियों से उनकी योनि की दोनों फांकों को फैलाकर जीभ लगा दी।
मैं भाभी की योनि की लाईन में धीरे-धीरे जीभ घुमाने लगा.. जिससे रेखा भाभी के कूल्हे हल्के-हल्के जुम्बिश से खाने लगे।

रेखा भाभी की योनि पहले से ही काफी गीली थी और अब तो योनि से पानी रिस कर मेरे मुँह पर व उनकी जाँघ पर फैलने लगा।

मैं रेखा भाभी की योनि को चूमता.. तो कभी उसे बड़ी जोरों से चूस रहा था। इससे रेखा भाभी की योनि का नमकिन रस मेरे मुँह में घुलने लगा, मेरे मुँह का स्वाद नमक के जैसा हो गया था। मगर फिर भी मैं सच कह रहा हूँ कि मुझे वो नमकीन रस.. शहद से कम नहीं लग रहा था।

अब तो रेखा भाभी भी मेरी जीभ के साथ साथ धीरे-धीरे अपनी कमर को हिलाने लगी थीं और जब-जब मेरी जीभ उनके अनारदाने को स्पर्श करती.. तो रेखा भाभी ऐसे उचक जातीं.. जैसे कि उन्हें कोई करेंट लग रहा हो।

मैं अपनी जीभ को रेखा भाभी की योनि में ऊपर से लेकर उनके गुदाद्वार तक घुमा रहा था.. मगर अभी तक मैंने अपनी जीभ को उनकी योनि द्वार में नहीं डाला था, बस कभी-कभी उसके ऊपर से ही गोल-गोल घुमा रहा था।

जब भी मैं ऐसा करता तो रेखा भाभी अपने कूल्हों को हिलाकर अपनी योनि द्वार को मेरी जीभ से लगाने का प्रयास करतीं.. मगर मैं अपनी जीभ को वहाँ से हटा लेता।

कुछ देर तक मैं ऐसे ही रेखा भाभी को तड़पाता रहा। मगर भाभी से ये सहन नहीं हुआ, इसलिए उन्होंने दोनों हाथों से मेरे सिर को पकड़ लिया और फिर अपने कूल्हों को थोड़ा सा उचका कर मेरे होंठों से अपने योनि द्वार को चिपका दिया।

मुझे भी भाभी को ज्यादा तड़पाना ठीक नहीं लगा.. इसलिए मैंने एक बार बड़ी जोर से उनके गुफा के मुहाने को चाटा और अपनी जीभ को लम्बा करके भाभी की गुफा में पेवस्त कर दिया।
इस बार फिर ना चाहते हुए भी उनके मुँह से एक हल्की ‘आह..’ सी निकल गई और उन्होंने मेरे सिर को जोर से दबा लिया।

मैं भी अब अपनी जीभ को रेखा भाभी के योनिद्वार में घुसा कर अन्दर तरफ घिसने लगा। इससे रेखा के मुँह से धीमी-धीमी कामुक सिसकारियाँ सी निकलनी शुरू हो गईं- उम्म्ह… अहह… हय… याह…

मैं अपनी जीभ को रेखा भाभी के योनिद्वार में कभी गोल-गोल तो कभी नुकीली करके अन्दर तक घिस रहा था और साथ ही जिन उंगलियों से मैंने रेखा भाभी की योनि की फांकों फैला रखा था, उन्हीं से उन्हें मसलना भी शुरू कर दिया।

अब तो भाभी ने भी अपनी सारी शर्म लाज भुला दी। उन्होंने दोनों हाथों से मेरे सिर को पकड़ लिया और जल्दी-जल्दी कूल्हों को हिला-हिला कर अपनी योनि को मेरे मुँह पर घिसने लगीं।
भाभी की हालत देखकर मुझसे भी रहा नहीं गया.. इसलिए मैंने भी अपनी जुबान की चपलता को तेज कर दिया।

कुछ ही पलों बाद रेखा भाभी ने दोनों हाथों से मेरे सिर को अपनी योनि पर बड़ी जोरों से दबा लिया, उनकी जाँघें मेरे सर पर कसती चली गईं.. जिससे मेरी नाक व मुँह दोनों दब गए।
अब मेरे लिए साँस लेना भी मुश्किल हो गया, मैं साँस लेने के लिए अपने सिर को जितना भी हिलाता.. रेखा भाभी उससे दुगनी ताकत से मेरे सिर को और अधिक अपनी योनि पर दबाने लगीं।

भाभी की योनि रह-रह कर मेरे चेहरे पर पानी उगलने लगी जैसे कि उनकी योनि में कोई सैलाब आ गया हो, योनिरस से मेरा सारा चेहरा भीग गया।

रेखा भाभी अब शाँत हो गई थीं मगर फिर भी काफी देर तक वो ऐसे ही मेरे सिर को अपनी जाँघों के बीच दबाए पड़ी रहीं। रेखा भाभी का काम हो गया था.. इसलिए वो शाँत हो गई थीं।

मगर मेरे अन्दर तो अब भी ज्वार-भाटा सा जोर मार रहा था, मेरे लिंग की तो ऐसी हालत हो रही थी जैसे कि उसकी नसें फट जाएंगी। मेरे लिंग ने पानी छोड़ छोड़ कर मेरे सारे अण्डरवियर को गीला कर दिया था।

सुमन के होते हुए मैं रेखा भाभी के साथ कुछ कर नहीं सकता था.. मगर मैं चाह रहा था कि रेखा भाभी मुझे भी इस तड़प से निजात दिला दें। इसलिए मैं धीरे से खिसक कर बिस्तर पर आ गया और रेखा भाभी के हाथ को पकड़ कर कपड़ों के ऊपर से अपने उत्तेजित लिंग पर रखवा दिया। मगर तभी रेखा ने झटका सा खाया जैसे कि उन्होंने कोई करेंट का तार छू लिया हो।

रेखा भाभी ने मेरे सर को अपनी जाँघों के बीच से निकाल दिया और जल्दी से अपने कपड़े ठीक करने लगीं।

मैं चुपचाप उन्हें देखता रहा। रेखा भाभी ने अपने कपड़े सही से करके फिर से उस चादर को ओढ़ लिया और सुमन के पास को खिसक गईं।

रेखा भाभी का काम हो गया था इसलिए वो मुझसे दूर भाग रही थीं.. मगर मैं तो अभी तक तड़प रहा था। इसलिए मैं भाभी को अपनी तरफ खींचने की कोशिश करने लगा। मगर वो अपनी जगह से बिल्कुल भी नहीं हिल रही थीं.. बल्कि सुमन के और अधिक पास खिसकने लगीं।

मैंने एक-दो बार कोशिश की और जब वो अपनी जगह से नहीं हिलीं.. तो मैं खुद ही उनके पास बेड पर चला गया। अब मैं भाभी के ऊपर पर चढ़ गया, रेखा भाभी मुझे अपने ऊपर से हटाने के लिए अपने हाथों से धकेलने लगीं मगर मैं कहाँ मानने वाला था, मैं उनसे चिपटा रहा और उनके गालों को चूमने-चाटने लगा।

मुझे रेखा भाभी के फूलों से भी नाजुक कोमल शरीर का अहसास हो रहा था। जिससे मुझे बहुत मजा आ रहा था। मैं पहले ही काफी उत्तेजित था और अब तो रेखा भाभी के मखमली शरीर का स्पर्श पाकर मैं और भी अधिक उत्तेजित हो गया था। इसी तरह मैं रेखा भाभी के कोमल शरीर पर लेटे हुए ही अपने शरीर को आगे-पीछे करने लगा.. जिससे मेरे लिंग को घर्षण प्राप्त होने लगा और कुछ क्षण बाद मेरा भी रस खलित हो गया और मेरे अन्दर का सारा ज्वार मेरे कपड़ों में ही निकल गया।

मैं अभी ठीक से शांत हुआ भी नहीं था कि तभी सुमन ने करवट बदली, मैं जल्दी से भाभी को छोड़कर अपनी चारपाई पर आ गया और रेखा भाभी तो ऐसे हो गईं.. जैसे कि वो बहुत ही गहरी नींद में सो रही हों।
हम दोनों डर कर ऐसे हो गए.. जैसे कि हमे साँप सूँघ गया हो।

एक बार ऊपर से ही सही मगर मेरे अन्दर का ज्वार अब शाँत हो गया था इसलिए मैंने दोबारा भाभी के पास जाने की कोशिश नहीं की।

मैंने सोचा कि अभी नहीं तो सुबह तो मेरा काम बन ही जाएगा.. इसलिए मैं चुपचाप अपनी चारपाई पर सो गया और कुछ देर बाद मुझे नींद भी आ गई।

सुबह रेखा भाभी से सम्बन्ध बनाने के रोमांच के कारण जब रेखा भाभी व सुमन उठे.. तभी मेरी भी नींद खुल गई। मेरी नींद खुलने के बाद भी मैं ऐसे ही सोने का नाटक करता रहा।

मैं ऐसा क्यों कर रहा था.. शायद ये लिखने की जरूरत नहीं है क्योंकि आप खुद समझदार है। करीब घण्टे भर बाद चाचा-चाची व रेखा भाभी का लड़का सोनू खेत में चले गए और सुमन कॉलेज चली गई, घर में बस रेखा भाभी ही रह गई।

मैं सोच रहा था कि अब तो मेरे और रेखा भाभी के बीच काफी कुछ हो गया है इसलिए वो खुद ही मेरे पास आ जाएंगी और अगर वो नहीं भी आएंगी, तो जब वो कमरे में सफाई के लिए आएंगी.. तो मैं उन्हें पकड़ लूँगा।
यह सोचकर मैं ऐसे ही अपनी चारपाई पर लेटा रहा मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ।

मैं काफी देर तक इन्तजार करता रहा मगर रेखा भाभी कमरे में नहीं आईं इसलिए मैं खुद ही उठकर बाहर चला गया।

जब मैं बाहर गया तो देखा कि रेखा भाभी आँगन में झाडू लगा रही थीं। मुझे देखते ही वो घबरा गईं और झाडू को वहीं पर छोड़कर रसोई में चली गईं। मुझे मालूम हो गया था कि रेखा भाभी बहुत डर रही हैं.. इसलिए वो ऐसे ही मेरे पास नहीं आएंगी, मेरे घर में रहते हुए वो अकेली कमरे में भी नहीं जाएंगी।

तभी मेरे दिमाग में एक तरकीब आई, मैंने रेखा भाभी को कुछ भी नहीं कहा और चुपचाप पानी की बाल्टी भरकर सीधा लैटरीन में घुस गया.. जो कि आँगन के एक कोने में थी।

मैंने लैटरीन में जाकर बस पेशाब ही की और फिर चुपचाप खड़ा होकर लैटरीन के रोशनदान से बाहर देखने लगा।

बस कुछ ही देर बाद रेखा भाभी रसोई से बाहर निकलीं.. पहले तो उन्होंने लैटरीन की तरफ देखा और जब उन्हें यकीन हो गया कि मैं लैटरीन में ही हूँ। तो वो उस कमरे में चली गईं.. जिसमें मैं सोया हुआ था।

पहले तो रेखा भाभी ने उस चारपाई को बाहर निकाल दिया.. जिस पर मैं सोया हुआ था। चारपाई बाहर निकालने के बाद उन्होंने एक बार फिर से लैटरीन की तरफ देखा और फिर कमरे की सफाई करने के लिए जल्दी से आँगन में पड़ी झाडू उठाकर उस कमरे में चली गईं।

मेरी तरकीब कामयाब हो गई थी, भाभी के कमरे में जाते ही मैं भी धीरे से बिना कोई आवाज किए लैटरीन से बाहर आ गया और उस कमरे में घुस गया।
मुझे देखते ही भाभी बुरी तरह घबरा गईं, वो जल्दी से बाहर जाना चाहती थीं.. मगर मैंने उन्हें दरवाजे पर ही पकड़ लिया और वहीं उन्हें दीवार से सटाकर उनके गालों को चूमने लगा।

डर के मारे रेखा भाभी के हाथ-पैर काँप रहे थे, जिसके कारण वो ठीक से कुछ बोल भी नहीं पा रही थीं, मुझसे छूटने का प्रयास करते हुए भाभी कंपकपाती आवाज में ही कहने लगीं- छ..छोओ..ड़ोओ…. म्म..मुउ…झेए.. नन…हींईई..ई.. छ..छोड़ओ.. उम्म्म… मैं.. श्श्शो..र.. म्मम..चाआआ.. ददूँगीईई…

मगर ऐसे मैं कहाँ छोड़ने वाला था, मैंने भाभी की पीठ के पीछे से अपने दोनों हाथों को डालकर उन्हें बांहों में भर लिया और फिर खींचकर बिस्तर पर गिरा लिया।
बिस्तर पर गिरने के बाद तो रेखा भाभी मुझसे छुड़ाने के लिए अपने हाथ पैर और भी अधिक जोरों से चलाने लगीं।

भाभी को शान्त करने के लिए मैं उनके ऊपर लेट गया और अपने हाथों से रेखा भाभी के दोनों हाथों को पकड़ कर उनकी गर्दन व गालों को चूमने लगा। भाभी के दोनों हाथों को मैंने फैलाकर पकड़ रखा था.. इसलिए वो अपने हाथों को तो नहीं हिला पा रही थीं मगर अब भी भाभी पैरों को हिलाकर छटपटा रही थीं और कंपकंपाती आवाज में यही दोहरा रही थी कि मुझे छोड़ दो.. नहीं तो मैं शोर मचा दूँगी।

मगर मैं ये कहाँ सुन रहा था, मैं तो भाभी गालों को चूमते-चाटते हुए उनके रस भरे होंठों की तरफ बढ़ने लगा मगर भाभी अपनी गर्दन को हिलाकर मेरे चुम्बन से बचने का प्रयास करने लगीं।
मैं जैसे ही उनके होंठों पर अपने होंठ रखता.. तो रेखा भाभी अपनी गर्दन को कभी दाएं तो कभी बाएं घुमा लेतीं।

ऐसा कुछ देर तक तो चलता रहा.. फिर तँग आकर मैंने भाभी के हाथों को छोड़ दिया और एक हाथ से उनके सर के बालों को पकड़ लिया, जिससे कि वो अपनी गर्दन ना हिला सकें और मैंने उनके होंठों पर अपने होंठ रख दिए।

अब रेखा भाभी अपनी गर्दन नहीं हिला सकती थीं.. वो बेबस सी हो गई थीं, मैं उनके दोनों होंठों को चूसने लगा। भाभी के होंठों को चूसते हुए ही मैं दूसरे हाथ से उनकी गोलाइयों को भी सहलाने लगा.. जिससे भाभी छटपटाने लगीं।

उनके दोनों हाथ अब आजाद थे.. इसलिए वो दोनों हाथों से धक्के और मुक्के मारकर मुझे अपने ऊपर से उतारने का प्रयास करने लगीं।

मैं कहाँ रूकने वाला था.. मैं रेखा भाभी के धक्के-मुक्के सहकर भी उनके होंठों के रस को पीता रहा और साथ ही दूसरे हाथ से उनके ब्लाउज व ब्रा को ऊपर खिसका कर उनके दोनों उरोजों को निर्वस्त्र भी कर लिया।

अब रेखा भाभी के नंगे नर्म, मुलायम और भरे हुए उरोज मेरे हाथ में थे.. जिन्हें मैं मसलने लगा। कुछ देर तो रेखा भाभी मेरा विरोध करती रहीं.. मगर फिर धीरे-धीरे उन्का विरोध कुछ हल्का पड़ने लगा।

रेखा भाभी के धक्के मुक्के अब कुछ हल्के व कम होने लगे.. शायद वो थक गई थीं। इसलिए मैं उनके सर के बालों को छोड़कर अपना दूसरा हाथ भी उनकी गोलाइयों पर ले आया और दोनों हाथों से उनके उरोजों को सहलाने व दबाने लगा।

जबकि अभी तक मैं उनके होंठों को भी चूस रहा था। कुछ देर तक तो ऐसे ही रेखा भाभी मेरा विरोध करती रहीं और मैं उन्हें मसलता और चूसता रहा।

मगर फिर धीरे-धीरे रेखा भाभी की साँसें भी गर्म व तेज होने लगीं, अब उन पर भी धीरे धीरे वासना की खुमारी चढ़ने लगी थी इसलिए अब उनका विरोध कुछ कम हो गया था।

अब भाभी विरोध करने की बजाए बस कसमसा ही रही थीं और मुझे छोड़ देने के लिए कह रही थीं। रेखा भाभी के होंठों का अच्छी तरह से रसपान करने के बाद मैंने उन्हें छोड़ दिया और थोड़ा सा नीचे खिसक कर उनके उरोजों पर आ गया।

रेखा भाभी के दूधिया उरोज ज्यादा बड़े नहीं थे.. बस औसत आकार के ही थे। मगर काफी सख्त थे और उन पर हल्के गुलाबी रंग के चूचुक थे.. जो कि अब तन कर सख्त हो गए थे, ऐसा लग रहा था मानो उनमें लहू भर गया हो।

भाभी के उरोजों को देखने के बाद मुझसे रहा नहीं गया.. इसलिए मैंने एक चूचुक को मुँह में भर लिया और किसी छोटे बच्चे की तरह उसे निचोड़-निचोड़ उसका रस चूसने लगा।
मैं भाभी के चूचुक को कभी चूसता.. तो कभी उसके चारों ओर अपनी जीभ गोल-गोल घुमा देता। मैं कभी-कभी भाभी के चूचुक को दाँत से हल्का सा काट भी लेता था.. जिससे भाभी कराह पड़तीं ‘उम्म्ह… अहह… हय… याह…’

मगर अब वो मुझे हटाने की कोशिश नहीं कर रही थीं.. बस कराहते हुए दबी जुबान से यही कहे जा रही थीं कि छोड़ दो मुझे!

भाभी के उरोजों को चूसते हुए ही मैंने धीरे-धीरे अपना एक हाथ उनकी जाँघों के बीच नीचे के गुप्त खजाने की तरफ भी बढ़ा दिया और उसे कपड़ों के ऊपर से ही सहलाने लगा।

रेखा भाभी ने नीचे पेंटी नहीं पहन रखी थी क्योंकि उन्होंने रात वाले कपड़े ही पहन रखे थे और उनकी पेंटी तो मैंने रात में ही उतार कर बिस्तर के नीचे कहीं गिरा दी थी। शायद वो अब भी वहीं पड़ी होगी, इसलिए मेरे हाथों को उनकी योनि का आभास उनकी साड़ी व पेटीकोट के ऊपर से ही महसूस होने लगा।

अब तो रेखा भाभी से भी नहीं रहा गया और ना चाहते हुए भी उनके मुँह से हल्की-हल्की सिसकियाँ फूटने लगीं।

मैं रेखा भाभी की योनि को सहलाते हुए ही धीरे-धीरे उंगलियों से उनकी साड़ी व पेटीकोट को भी ऊपर की तरफ खींचने लगा।

मुझसे छूटने की कोशिश में उनकी साड़ी व पेटीकोट पहले ही घुटनों तक हो चुके थे और बाकी का काम मैंने कर दिया, नीचे पेंटी नहीं होने के कारण उनकी साड़ी व पेटीकोट के ऊपर होते ही अबकी बार मेरे हाथ ने सीधा उनकी नंगी योनि को स्पर्श किया.. जो कि मुझे गीली लग रही थी।

रेखा भाभी की नंगी योनि पर मेरे हाथ का स्पर्श होते ही वो और अधिक कसमसाने लगीं और मेरे हाथ को अपनी योनि पर से हटाकर अपनी साड़ी व पेटीकोट को सही से करने लगीं।

मगर तभी मैंने उनके उरोजों को छोड़ दिया और उनके मखमली व दूधिया सफेद गोरे पेट को चूमता हुआ धीरे से खिसक कर नीचे आ गया।

भाभी अपनी साड़ी व पेटीकोट को सही करें.. उससे पहले ही मैंने उनके हाथ को पकड़ लिया और साड़ी व पेटीकोट को फिर से उनके पेट तक उलटकर उनकी माँसल गोरी जाँघों व दोनों जाँघों के बीच उनके गुप्त खजाने को ध्यान से देखने लगा।

रेखा भाभी की दूधिया सफेद गोरी व मासंल भरी हुई जाँघें और दोनों जाँघों के बीच गहरे काले व घुँघराले बाल भरे हुए थे.. जो कि उनकी योनि को छुपाने की नाकामयाब कोशिश कर रहे थे। भाभी की योनि पर इतने गहरे, घने बाल थे और उन्होंने लम्बाई के कारण योनि पर ही गोल-गोल घेरा बनाकर उनकी पूरी योनि को छुपा लिया था।

उनकी योनि के बालों को देख कर लग रहा था जैसे कि वो उनकी योनि के पहरेदार हों। मगर योनि की लाईन के पास वाले बाल योनि रस से भीग कर योनि से चिपके गए थे.. इसलिए योनि की गुलाबी फाँकें और दोनों फांकों के बीच का हल्का सिन्दूरी रंग इतने गहरे बालों के बीच अलग ही नजर आ रहा था।

रेखा भाभी की योनि को देखने के बाद मुझसे रहा नहीं गया और अपने आप ही मेरा सर उनकी जाँघों के बीच झुकता चला गया।

सबसे पहले तो मैंने उनकी दूधिया गोरी, माँसल व भरी हुई जाँघों को बड़े जोरों से चूम लिया.. जिससे रेखा भाभी के मुँह से एक हल्की ‘आह..’ सी निकल गई। भाभी ने मुझे हटाकर दोनों हाथों से अपनी योनि को छुपा लिया और वो अब भी यही दोहरा रही थीं कि मुझे छोड़ दो।

मुझे पता चल गया था कि रेखा भाभी अब उत्तेजित होने लगी हैं और दिखावे के लिए ही ऐसा बोल रही हैं इसलिए मैंने उनके हाथों को पकड़ कर अलग कर दिया और फिर से उनकी योनि पर अपने प्यासे होंठों को रख दिया।
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इस बार तो भाभी के मुँह से सिसकी निकल गई और अपने आप ही उनकी जाँघें थोड़ा सा फैल गईं।

मैंने रेखा भाभी की जाँघों को थोड़ा सा और अधिक फैला दिया और फिर अपने दोनों हाथों से उनके योनि की फांकों को फैलाकर अपनी जीभ को उनकी योनि की लाईन में घिसने लगा जिससे भाभी के मुँह से हल्की-हल्की सिसकारियां फूटने लगीं।

भाभी का विरोध अब काफूर हो गया था, मगर जब कभी मेरी जीभ उनकी योनि के अनारदाने को छू जाती.. तो वो सिहर उठतीं और मेरे बालों को पकड़ कर मुझे वहाँ से हटाने लगतीं।
रेखा भाभी अब उत्तेजना के वश में थीं.. जिसका मैं पूर्णतः फायदा उठा रहा था।

कुछ देर तक मैं ऐसे ही अपनी जीभ को रेखा भाभी की योनि पर घिसता रहा और फिर थोड़ा सा नीचे उनके प्रेम द्वार पर आ गया। उनकी योनि पूरी तरह गीली हो गई थी।

मैं अपनी जीभ को रेखा भाभी के योनिद्वार के अन्दर डालने की बजाए उस पर गोल-गोल घुमाने लगा, जिससे रेखा भाभी की सिसकारियां तेज हो गईं। वो मेरी जीभ के साथ-साथ ही अपने नितम्बों को बिस्तर पर रगड़ने लगीं।

अब भाभी की योनि का खेल शुरू होने वाला ही है। यदि आप लोग चाहें तो एक बार अपने अपने सामान को हिला कर खाली कर लें।

कुछ देर तक मैं ऐसे ही अपनी जीभ को भाभी के चूतद्वार पर गोल-गोल घुमाता रहा.. मगर मैंने जीभ को चूत के अन्दर नहीं डाला।

कुछ देर तक जब मैं ऐसे ही करता रहा तो भाभी ने अपने दोनों हाथों से मेरे सर के बालों को पकड़ लिया और फिर खुद ही अपने कूल्हों को उचका कर अपने चूतद्वार को मेरे होंठों से लगा दिया।

मैंने भी रेखा भाभी के चूतद्वार को एक बार प्यार से चूम लिया और फिर अपनी जीभ को नुकीला करके उनके चूतद्वार में घुसा दिया.. जिससे उनके मुँह से बड़ी जोरों से सिसकी ‘आह्ह..’ निकल गई।

अब उन्होंने मेरे सर को अपनी दोनों जाँघों के बीच जोर से दबा लिया। मैंने धीर से रेखा भाभी की जाँघों को फिर से फैला दिया और धीरे-धीरे अपनी जीभ से उनके चूतद्वार में हरकत करने लगा।

मेरी जीभ अब भाभी की चूत द्वार में पूरी तरह से घूम रही थी.. जिससे उनके मुँह से जोर-जोर से सिसकारियाँ फूटने लगीं। मेरी जीभ के साथ साथ उनकी कमर भी हरकत में आ गई थी।

धीरे धीरे रेखा भाभी ने अपनी कमर की हरकत को तेज कर दिया और वो जोर-जोर से मादक सिसकारियां भरने लगीं। मैं समझ गया कि भाभी का रस स्खलित होने वाला है।

मैंने सोचा कि कहीं आज भी मैं कल की तरह प्यासा ना रह जाऊँ.. इसलिए मैंने भाभी की जाँघों के बीच से अपना सर निकाल लिया और रेखा भाभी की तरफ देखने लगा।
उन्होंने आँखें बन्द कर रखी थीं, उत्तेजना के कारण उनके होंठ कंपकंपा रहे थे और गोरा चेहरा बिल्कुल गुलाबी हो रखा था।

जब कुछ देर तक मैंने कोई हरकत नहीं की.. तो रेखा भाभी ने हल्की से आँखें खोलकर मेरी तरफ देखा, उत्तेजना व खीझ के भाव उनकी आँखों में स्पष्ट नजर आ रहे थे।

भाभी को देखकर मैं हल्का सा मुस्कुरा दिया और जल्दी से अपने कपड़े उतारने लगा। रेखा भाभी ने मेरी मुस्कुराहट का कोई जवाब नहीं दिया और फिर से अपनी आँखें बन्द कर लीं।

रेखा भाभी को पता था कि मैं क्या कर रहा हूँ और अब आगे उनके साथ क्या करने वाला हूँ.. फिर भी वो चुपचाप ऐसे ही लेटी रहीं।

मैं अपने सारे कपड़े उतार कर रेखा भाभी के ऊपर लेट गया.. जिसका रेखा भाभी ने कोई विरोध नहीं किया।

अब रेखा भाभी का मखमल सा मुलायम और नाजुक शरीर मेरे नीचे था और उनके सख्त उरोज व तने हुए चूचुक मुझे अपने सीने में चुभते हुए से महसूस हो रहे थे।

रेखा भाभी को पता था कि अब क्या होने वाला है इसलिए मेरे ऊपर आते ही उन्होंने खुद ही अपनी जाँघों को फैलाकर मुझे अपनी दोनों जाँघों के बीच में ले लिया।

अब मेरा उत्तेजित लिंग रेखा भाभी की चूत के ठीक ऊपर था, उनकी चूत के बाल मुझे अपने लिंग पर महसूस हो रहे थे।

मेरी पायल भाभी ने मुझे इस खेल का कुशल खिलाड़ी बना दिया था इसलिए मैंने सीधा रेखा भाभी की चूत में अपना लिंग डालने की बजाए उन पर लेटे-लेटे ही एक हाथ से अपने लिंग को पकड़ कर धीरे-धीरे उनके चूतद्वार पर घिसने लगा जिससे उनके मुँह से फिर हल्की-हल्की सिसकारियाँ फूटने लगीं ‘उम्म्ह… अहह… हय… याह…’

रेखा भाभी की चूत प्रेमरस से पूरी तरह गीली हो रही थी.. इसलिए मेरा लिंग आसानी से उसमें फिसल रहा था। मैं अपना लिंग भाभी की चूत में घिसते हुए ही उनके चेहरे की तरफ देखने लगा, उन्होंने आँखें बन्द कर रखी थीं। उत्तेजना के कारण उनके होंठ कंपकंपा रहे थे, साँसें बड़ी जोर से चल रही थीं।

वो मेरे लिंग प्रवेश करवाने का बेसब्री से इन्तजार कर रही थीं। कुछ देर भाभी की चूत पर अपने लिंग को घिसता रहा और फिर धीरे से चूत के मुहाने पर रखकर एक झटका लगा दिया।

रेखा भाभी की चूत प्रेम रस से पूरी तरह गीली हुई पड़ी थी और वो शारीरिक और मानसिक रूप से लिंग का स्वागत करने के लिए तैयार भी थीं.. इसलिए एक ही झटके में मेरा आधे से ज्यादा लिंग उनकी चूत में समा गया।
भाभी की एक तेज चीख निकल पड़ी- इईई.. श्शशश.. अ..आआह.. आउऊच.. श्श..
वो दर्द से चीख पड़ीं।

मैंने अपने आपको व्यवस्थित करके एक बार अपने लिंग को थोड़ा सा बाहर खींच लिया और फिर से एक झटका लगा दिया। इस बार फिर से रेखा भाभी के मुँह से ‘अ..आआहह.. आउऊचश्श..’ की आवाज निकल गई। इस बार मेरा समस्त लिंग उनकी चूत में समा गया था।

रेखा भाभी की चूत काफी गर्म थी और उसमें काफी कसाव था। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे कि मेरा लिंग किसी दहकती भट्टी में चला गया हो।
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विनोद भैया के स्वर्गवास के बाद शायद भाभी ने किसी से सम्बन्ध नहीं बनाए थे। मैंने उन्हें काफी उत्तेजित भी कर दिया था.. इसलिए उत्तेजना के कारण भी चूत में काफी संकुचन हो रहा था।

मैंने एक बार फिर से भाभी के चेहरे की तरफ देखा, अब भी उन्होंने आँखें बन्द कर रखी थीं। हल्की सी पीड़ा और उत्तेजना के मिले जुले भाव उनके चेहरे पर उभर रहे थे।

भाभी का मासूम सा चेहरा देखकर मुझे उन पर प्यार आ गया। इसलिए मैंने एक बार उनके माथे को चूम लिया और फिर गालों पर से होते हुए उनके होंठों पर आ गया। चूमने के साथ ही मेरी कमर भी हरकत में आ गई। मैं धीरे-धीरे धक्के लगाने लगा.. जिससे मेरा लिंग रेखा भाभी की चूत में अन्दर बाहर होने लगा, उनके मुँह से हल्की-हल्की सी सिसकारियाँ फूटने लगीं। साथ ही अपने आप ही रेखा भाभी के हाथ मेरी पीठ पर आ गए और मेरी पीठ पर धीरे-धीरे इधर-उधर रेंगने लगे।

अभी तक मैं रेखा भाभी के होंठों को चूस रहा था.. मगर अब पहली बार रेखा भाभी ने भी हल्का सा मेरे होंठों को अपने होंठों के बीच दबाया था। अब थोड़ा-थोड़ा वो भी मेरे चुम्बन का जवाब देने लगी थीं इसलिए मैंने अपनी जीभ उनके मुँह में डाल दी.. जिसे वो कभी कभी हल्का सा चूसने लगीं।

धीरे धीरे धीरे मैं अपनी कमर की हरकत को बढ़ाने लगा.. जिससे रेखा भाभी की सिसकारियाँ और तेज होने लगीं। अब धीरे धीरे भाभी भी खुलने लगी थीं क्योंकि अब वो मेरी जीभ को जोरों से चूसने लगी थीं। साथ ही उन्होंने अपने पैरों को भी मेरे पैरों में फँसा लिया और वो भी धीरे-धीरे अपने कूल्हों को उचकाने लगीं।

अब रेखा भाभी भी मेरा साथ दे रही थी इसलिए मैंने अपनी गति बढ़ा दी और तेजी से धक्के लगाने लगा। मेरे साथ साथ भाभी भी जल्दी-जल्दी अपने कूल्हे उचकाने लगीं और उनकी सिसकारियाँ भी तेज हो गईं।

पूरा कमरा रेखा भाभी की सिसकारियों से गूँजने लगा, भाभी की सिसकारियों का शोर सुनकर मेरा जोश बढ़ता जा रहा था इसलिए मैं अपनी पूरी ताकत के साथ धक्के लगाने लगा।

भाभी भी कहाँ पीछे रहने वाली थीं वो भी जोर जोर से सिसकारियाँ भरते हुए मेरे धक्कों का जवाब दे रही थीं। मेरी और भाभी की साँसें उखड़ने लगी थीं.. शरीर पसीने से तर हो गए थे मगर हम दोनों में से कोई भी पीछे रहना नहीं चाह रहा था, हम दोनों को ही अपनी अपनी मंजिल पर पहुँचने की जल्दी लगी थी।

फिर तभी भाभी के गर्भ की गहराई में जैसे कि कोई विस्फोट सा हो गया, भाभी बड़ी जोरों से चिल्ला ही पड़ीं- इईई.. श्शश.. अआआ.. आह्ह्ह्हह..
उनके हाथ-पैर मुझसे लिपटते चले गए, शरीर अकड़ गया और उनकी चूत ने मेरे लिंग व अण्डकोष को अपने प्रेमरस से नहला दिया।

रेखा भाभी का इतना उत्तेजक कामोन्माद देखकर मैं भी जल्दी ही चरम पर पहुँच गया और दो-तीन धक्कों के बाद ही मैंने अपने भीतर का सारा लावा रेखा भाभी की चूत में उड़ेल दिया।

रसखलित होने के बाद कुछ देर तक तो मैं रेखा भाभी के ऊपर ही पड़ा रहा और फिर पलट कर उनके बगल में लेट गया।

अब सब कुछ शाँत हो गया था ऐसा लग रहा था जैसे कि अभी-अभी कोई तूफान आकर चला गया है। कमरे में बस मेरी और रेखा भाभी की उखड़ी हुई साँसों की आवाज ही गूँज रही थी.. जिन्हें हम दोनों काबू में करने की कोशिश कर रहे थे।

कुछ देर तक हम दोनों ऐसे ही पड़े रहे और फिर रेखा भाभी उठ कर अपने कपड़े ठीक करने लगीं।
मैंने रेखा भाभी की तरफ देखा तो उन्होंने नजरें झुका लीं.. मगर संतुष्टि के भाव उनके चेहरे पर स्पष्ट नजर आ रहे थे।

कपड़े ठीक करके रेखा भाभी कमरे से बाहर चली गईं। रेखा भाभी के बाद मैं भी उठकर बाहर आ गया और फिर तैयार होकर रोजाना की तरह ही खेतों में चला गया।

इसके बाद करीब महीने भर तक मैं गाँव में रहा और काफी बार रेखा भाभी से सम्बन्ध बनाए। पहले एक-दो बार तो वो मना करतीं.. मगर फिर बाद में तो वो खुद ही मेरे पास आने लगीं।

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