Didi Please Ek Baar Chodne Do Na

Didi Please Ek Baar Chodne Do Naनमस्ते दोस्तो, मैं रजत हूँ, मेरी उमर 18 साल है, पँजाब का रहने वाला हूँ। मेरे परिवार में हम कुल पाँच लोग हैं- पापा, मम्मी मेरी बड़ी बहन लैला, मैं और मेरी छोटी बहन रिमझिम Didi Please Ek Baar Chodne Do Na !

लैला दीदी मुझसे सात साल बड़ी हैं और रिमझिम मुझसे 2 साल छोटी है। मम्मी, पापा दोनो केंद्र सरकार के महकमों में नौकरी करते हैं और अपनी नौकरी के सिलसिले में अकसर उनको दिल्ली या दूसरे शहरों में आना जाना पड़ता है। कभी-कभी तो दोनो एक ही समय शहर से बाहर होते हैं।

दोस्तो, यहाँ मैं कुछ बातें स्पष्ट कर देना चाहता हूँ। पहली भले ही यह गाथा मेरी बहनों के बारे में है परन्तु यह पारिवारिक यौन गाथा नहीं है। दूसरे यह कोई कहानी नहीं है बल्कि आपको मैं वो बताने जा रहा हूँ जो मैंने बहुत बार अपनी आँखों देखा है।

बात तब की है जब लैला दीदी 18 साल की नवयौवना हो चुकी थी। बला की खूबसूरत तो लैला दीदी थी ही, ऊपर से कुदरत ने दीदी को यौवन के कटाव और उठान भी भरपूर दिये थे, मतलब दीदी की छाती और कूल्हे अपनी हमजोलियों के मुकाबले ज्यादा ही बड़े थे। लैला दीदी उन दिनों दो ही जगह मिलती थी, या तो शीशे के सामने या घर के मेन गेट पर।

बहुत से आवारा किस्म के लड़के हमारे घर के चक्कर लगाने लगे थे, उनमें से कुछ लड़के दीदी को कमेंट भी देते थे जोकि दीदी को अच्छा लगता था।

धीरे-धीरे मम्मी को यह बात पता चल गई और वो दीदी को बात बात पर डाँटने लगी। मम्मी ने दीदी के घर से बाहर अकेले जाने पर भी पाबंदी लगा दी।

दीदी जब भी घर से बाहर जाती तो मम्मी मुझे दीदी के साथ भेजने लगी। थोड़े दिन तो सब ठीक चलता रहा। धीरे-धीरे दीदी को हर जगह मुझे साथ ले जाना चुभने लगा। खासकर जहाँ लड़के दीदी का पीछा करते वहाँ दीदी मुझे डाँटने लगती।

ऐसे ही एक दिन दीदी मम्मी से अपनी एक सहेली के घर जाने का बोल कर मुझे साथ लेकर घर से निकली। घर से थोड़ा आगे जाकर दीदी ने मुझसे कहा- अगर तू मेरी बातें मम्मी को नहीं बताएगा तो तुझे रोज एक बढ़िया वाला चॉकलेट लेकर दिया करुँगी और आज से ही महीने में दो बार बड़ा गिफ़्ट जो भी तू माँगेगा लेकर दिया करुँगी।

मैं खुश होते हुये बोला- ठीक है दीदी ! आज से जैसा तुम कहोगी, वैसा ही करुँगा, पर यह चॉकलेट और गिफ़्ट वाली बात भूलना मत।

फ़िर दीदी ने मुझसे कहा- हम डौली (दीदी की सहेली) के घर मालगोदाम (पुराने बंद पड़े फ़सल रखने के सरकारी गोदाम का क्षेत्र जो अब रास्ते के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है) वाले रास्ते से जायेंगे पर वहाँ पे कुछ आवारा लड़के बैठे होते हैं तो तू एक काम कर, तू यहीं पर पंद्रह मिनट रुकने के बाद आना ताकि अगर वो लड़के मेरे को तंग कर रहे हों तो मैं उनसे लड़ झगड़ के उनको भगा दूँ नहीं तो वो तुझे भी तंग करेंगे।

मैंने कहा- ठीक है दीदी !

और दीदी मुझे वहाँ छोड़ कर मालगोदाम में चली गई।

उन दिनों मेरे पास घड़ी तो थी नहीं जो मैं 15 मिनट इन्तज़ार करता रहता। शायद मैंने 4-5 मिनट इन्तज़ार की और मैं भी मालगोदाम में चला गया। थोड़ा आगे जा के मैंने देखा कि चार लड़कों ने लैला दीदी को पकड़ा हुआ था और दीदी को लेकर वो सभी एक गोदाम में जा रहे थे। पहले तो मैं दीदी को उनसे छुड़ाने के लिये जाने लगा था, फ़िर मुझे दीदी की बात याद आई कि जब तक मैं उनको भगा ना दूँ, तुम मत आना, नहीं तो वो तुमको मारेंगे।

तो मैंने सोचा कि मैं छिप कर देखता हूँ, जब दीदी उनको भगा देगी तो मैं दीदी के पास चला जाऊँगा, और मैं छिप कर उनको देखने लगा।

मैंने देखा सभी लड़कों के लण्ड उनकी पैंट से बाहर थे, वो लड़के लैला दीदी की छाती को और उनके चूतड़ों को दबा रहे थे और दीदी उनके लंड दबा रही थी। थोड़ी देर बाद वो लड़के वहाँ से चले गये। उनके जाने के बाद मैं भाग कर दीदी के पास गया।

Didi Please Ek Baar Chodne Do Na

दीदी बोली- भाग गये साले।

मैंने पूछा- दीदी, उन्होंने तुम्हारे दुद्दू और चूतड़ क्यों पकड़े हुये थे?

तो दीदी बोली- पकड़े थोड़े थे, वो तो मिलकर मुझे मार रहे थे।

तो मैंने पूछा- और तुमने उनकी नुन्नियाँ क्युँ पकड़ रखी थी?

तो दीदी बोली- पकड़ नहीं रखी थी बुद्धू ! मैं भी उनकी नुन्नी पे मार रही थी क्यूंकि लड़कों की नुन्नी पे मारो तो बहुत दर्द होता है।

फ़िर दीदी ने कहा- तुम मम्मी को यह लड़ाई वाली बात मत बताना, तुमने कसम खाई है कि चॉकलेट और गिफ़्ट के बदले मेरी बातें तुम मम्मी को नहीं बताओगे।

मैंने कहा- ठीक है दीदी, नहीं बताऊँगा पर एक चॉकलेट और लेकर दो।

दीदी और मैं डौली दीदी के घर गये, वहाँ कुछ देर बिताने के बाद हम घर वापिस आ गये।

रास्ते में दीदी ने मुझे एक और चॉकलेट लेकर दी।

इसके बाद यह रोज की बात हो गई। दीदी किसी न किसी बहाने से मुझे साथ लेकर घर से निकलती और मुझे बाहर खड़ा करके मालगोदाम में चली जाती, वहाँ खेल चलता रहता, जिसे मैं छिप के देखता रहता।

मैं दीदी को पूछता कि दीदी आपको रोज़ इन लड़कों के साथ लड़ना पड़ता है तो आप क्यों इस रास्ते आने की ज़िद करती हो?

तो दीदी बोली- रज्जू, यह रास्ता छोटा है और बुद्धू ! तू लड़ने की चिंता न कर ! अगर तू कहे तो मैं आज ही इनको दोस्त बना सकती हूँ।

मैंने कहा- दीदी अगर ये दोस्त बन गये तो अच्छा ही होगा। फ़िर हमसे कोई भी पंगा लेने की हिम्मत नहीं करेगा।

दीदी बोली- सोच ले, अगर ये दोस्त बन गये तो फ़िर इनके घर भी आना जाना पड़ेगा।

मैंने कहा- दीदी, उसमें क्या है, हम चले जाया करेंगे इनके घर।

तो दीदी बोली- चल ठीक है, तू यहीं रुक, मैं इनको दोस्त बना कर आती हूँ।

फ़िर दीदी थोड़ी देर में वापिस आई और बोली- रज्जू, वो हमारे दोस्त बनने को तैयार हैं पर हमको इन में से एक लड़के के घर जाकर चाय पीनी पड़ेगी।

मैंने कहा- ठीक है दीदी, चलो चाय पी आते हैं।

फ़िर हम सब वहाँ से चल पड़े। उस लड़के के घर में कोई नहीं था, वो अकेला रहता था। उसके घर में दो कमरे थे। एक कमरे में वीडियो गेम पड़ी थी, उसने मुझे 3-4 चॉकलेट दिये और कहा- रज्जू, तू चोकलेट खा, वीडियो गेम खेल और मस्ती कर ! हम तब तक दूसरे कमरे में चाय पीते हैं और तेरी बहन के साथ बातें करते हैं।

मैंने कहा- ठीक है !

तो उसने पूछा- देख रज्जू, तू और तेरी बहन अब हमारे दोस्त हो, इसलिये चाय पीने के बाद हम लोग तेरी बहन के साथ थोड़ी दोस्तों वाली मस्ती करेंगे, और तू चोकलेट की चिंता मत कर, वहाँ अलमारी में और भी पड़े हैं, ले लेना जितने खाने हों।

मैंने कहा- ठीक है।

फ़िर वो बोला- तू उस रूम में आयेगा तो तेरी बहन के साथ हमारी मस्ती खराब हो जायेगी और फ़िर हमारी दोस्ती खत्म।

मैंने कहा- ठीक है, मैं नहीं आऊँगा पर अगर मुझे कुछ चहिये होगा तो क्या करुँ?

तो वो बोला- हम खिड़की खुली रखेंगे, तू आवाज़ दे देना अगर कुछ चहिये हो तो।

मैंने कहा- अगर मैं आपकी मस्ती खराब ना करुँ फ़िर तो उस कमरे में आ सकता हूँ?

तो उसने कहा- इस बारे में बाद में सोचेंगे, फ़िलहाल तू इधर अपनी मस्ती कर और दूसरे कमरे में हमें मस्ती करने दे तेरी बहन के साथ ।

मैंने कहा- ठीक है !

और वो दूसरे कमरे में चला गया। मैं वहाँ बैठ कर वीडियो गेम खेलने लगा।

15-20 मिनट बीत गये, मैंने सोचा- किसी और गेम की कैसेट मांगता हूँ।

मैं खिड़की पर गया उसको आवाज़ देने के लिये तो क्या देखा कि मेरी बहन की शर्ट ऊपर उठी हुई थी और उसके दुद्धू नंगे थे और उन सभी के लन्ड पैंट की ज़िप से बाहर थे, सभी लैला दीदी के साथ गुथ्थम-गुथ्था थे, लड़के लैला दीदी के दुधू के साथ और लैला दीदी उन के लन्ड के साथ खेल रही थी।

यह देख कर मुझे बहुत अजीब सा लगने लगा।

फ़िर मेरे को याद आया कि मुझे और गेम की कैसेट लेनी थी तो मैं उस कमरे के दरवाजे पर गया, मैंने दरवाजे को धक्का दिया तो दरवाजा खुल गया।

मैं अंदर गया और बोला- आप लोग तो मस्ती करने वाले थे पर ये क्या कर रहे हो मेरी दीदी के दुधू के साथ?

तो वो बोले- हम मस्ती करने वाले थे पर इतने दिन लड़ाई में हमने तेरी दीदी के दुद्धू पर मारा है ना और तेरी दीदी ने हमारे लण्ड पर तो हमने सोचा कि हम तेरी दीदी के दुद्दू सहला कर और तेरी दीदी हमारे लण्ड सहला के एक दूसरे का दर्द दूर करते हैं पहले, और रज्जू ये भी तो एक तरह की मस्ती ही तो है।

और बोले- रज्जू, अब तो हम सब दोस्त हैं ना तो दोस्ती में मस्ती के साथ-साथ एक दूसरे का दर्द भी दूर हो जाये तो इसमें बुरा क्या है?

तो मैं बोला- ठीक है।

तो वो बोले- तेरे को कहा था न कि तू गेम खेल और चोकलेट खा के मस्ती कर ! फ़िर तू यहाँ क्यूं आया?

मैंने कहा- मेरे को और कोई गेम की कैसेट चाहिये।

तो वो बोले- और कैसेट तो है नहीं।

मैंने कहा तो फ़िर मेरे को भी यहाँ बैठने दो। यह कहानी आप अन्तर्वासना.कॉम पर पढ़ रहे हैं।

उन्होंने कहा- चल ठीक है बैठ जा पर देख जब तूने मस्ती की तो हमने तेरी मस्ती खराब नहीं की ना? तो अब तू भी हमारी मस्ती खराब मत करना। तेरे को कुछ और खाने का है तो ये ले पैसे और अपने लिये चीज़ ले आ।

मैंने पैसे ले लिये और कहा- मैं बाद में चीज़ ले लूँगा। आप अपनी मस्ती करो मैं आपको तंग नहीं करुंगा।

और मैं कोने में रखे स्टूल पर बैठ गया। वो लोग अपनी मस्ती करते रहे। कभी वो लड़के दीदी के दुद्धू दबाते-सहलाते कभी चूसने लगते, ऐसे ही दीदी बारी बारी से उनके लण्ड कभी सहलाती और कभी चूसने लगती।

फ़िर मैंने देखा कि उन सभी के लण्ड से सफ़ेद सा पानी निकला जो दीदी पी गई। फ़िर दीदी ने अपने दुद्धू शर्ट में डाले और उन लड़कों ने अपने लण्ड पैंट के अंदर किये और फ़िर दीदी और मैं घर वापिस आ गये।

वो लोग अपनी मस्ती करते रहे। कभी वो लड़के दीदी के दुद्धू दबाते-सहलाते कभी चूसने लगते, ऐसे ही दीदी बारी बारी से उनके लण्ड कभी सहलाती और कभी चूसने लगती।

फ़िर मैंने देखा कि उन सभी के लण्ड से सफ़ेद सा पानी निकला जो दीदी पी गई। फ़िर दीदी ने अपने दुद्धू शर्ट में डाले और उन लड़कों ने अपने लण्ड पैंट के अंदर किये और फ़िर दीदी और मैं घर वापिस आ गये।

रास्ते में दीदी ने मुझे फ़िर से मम्मी को ये बातें ना बताने की कसम याद दिलाई।

घर पहुँचने के बाद दीदी भी खुश थी और मैं भी। दीदी क्युँ खुश थी आप समझ सकते हो, मैं इसलिये खुश था कि वीडियो गेम खेलने को मिली, ढेर सारे चोकलेट खाने को मिले ऊपर से 50 रूपए मिले अलग से।

मेरी उस समय की सोच के अनुसार ये सब मेरे लिये बहुत ही अच्छा था।

फ़िर क्या ! लैला दीदी रोज मम्मी से कभी सहेली के घर तो कभी काम से मार्किट जाने का बोलती और मुझे साथ लेकर उस लड़के के घर पहुँच जाती। वहाँ मेरे लिये ढेरों चोकलेट होते, नई-नई वीडियो गेम्स होती और पचास रुपए जाते ही मिल जाते। मैं पैसे अपनी ज़ेब में रख लेता और चोकलेट खाते हुये वीडियो गेम का मज़ा लेता रहता और उधर दूसरे कमरे में वो लड़के मेरी दीदी के साथ मस्ती करते।

कभी कभी जब मैं वीडियो गेम खेलते-खेलते बोर हो जाता तो मैं भी उस कमरे में चला जाता और कोने में रखे स्टूल पर बैठ कर उनकी मस्ती देखता। पहले पहल जो मस्ती वो मेरी दीदी के साथ कपड़े पहने हुये करते थे धीरे-धीरे अपने और मेरी दीदी के कपड़े उतार के नंगे बदन करने लगे।

फ़िर एक दिन मम्मी ने बताया कि दिल्ली वाली बुआ जी की बेटी की मंगनी है और मंगनी से अगले दिन रात को उनके घर जागरण है, सो हम सब आज ही रात को ट्रेन से दिल्ली जा रहे हैं।

यह सुन के रिमझिम तो बहुत खुश हुई पर ना तो मुझे अच्छा लगा ना ही लैला दीदी को, क्युँकि दीदी को अपनी मस्ती की चिंता थी और मुझे अपनी मस्ती और पैसों की।

थोड़ी देर बाद दीदी मम्मी से बोली- मम्मी, आप जाओ मैं नहीं जा सकती। मेरे पेपर सिर पर हैं, मुझे अपनी पढ़ाई का नुकसान नहीं करना।

मम्मी-पापा ने दीदी को बहुत कोशिश की मनाने की पर दीदी ज़िद पर अड़ी हुई थी कि शादी में चली जाउँगी, मंगनी पर नहीं जाना तो नहीं जाना।

आखिरकार यह फ़ैसला हुआ कि लैला दीदी और मैं यहीं रहेंगे और मम्मी पापा और रिमझिम दिल्ली जायेंगे।

पापा-मम्मी और रिम्स (रिमझिम को हम प्यार से रिम्स बुलाते हैं) शाम को कार से दिल्ली चले गये। उनके जाने के बाद लैला दीदी मुझ से बोली- रज्जू हम रोज अपने नये दोस्तों के घर जाते हैं, मम्मी-पापा के होते तो ये नामुमकिन है पर आज जब घर पर हम अकेले हैं तो आज तो हम उनको अपने घर बुला सकते हैं, हैं न?

मैंने कहा- दीदी अगर किसी ने देख लिया और मम्मी-पापा को बता दिया तो?

दीदी बोली- रज्जू बात तो तेरी ठीक है पर हम एक काम करते हैं, हम उनको रात को को ग्यारह बजे के बाद आने को बोलते हैं जब गली में सब सो जायेंगे और उनको हम सुबह पाँच बजे जाने को कह देंगे।

मैंने कहा- दीदी फ़िर भी अगर मम्मी को पता चल गया तो आपकी पिटाई तो होगी ही आप मेरे को भी पिटवाओगी।

तो दीदी बोली- रज्जू तू तो ऐसे ही घबरा जाता है, दिसम्बर के महीने में रात को ग्यारह बजे के बाद कौन होगा गली में देखने वाला? और सुबह 5 बजे तो इतनी धुंध होती है कि एक हाथ को दूसरा हाथ दिखाई ना दे। और आज पता है वो तेरे लिये इम्पोरटेड चोकलेट लायेंगे जो तूने पहले कभी नहीं खाये होंगे, ऊपर से आज पता है तेरे को 50 नहीं 100 रुपए मिलेंगे।

यह सुनते ही मैंने कहा- ठीक है दीदी, बुला लो।

दीदी ने कहा- तू साईकिल से जा और भाग कर उनको बोल आ कि दीदी ने कहा है आज हम अकेले हैं घर पर, आज आप हमारे घर आना रात को ग्यारह बजे के बाद।

मैं जाकर उनको बोल आया और यह भी कहा कि दीदी ने बोला है मेरे लिये इम्पोर्टेड चोकलेट लेकर आयें।

रात को 10:55 पर दीदी ने मुझे घर से बाहर भेज दिया ताकि जब वो आयें तो न तो डोरबेल बजानी पड़े और ना ही दरवाज़ा खोलना पड़े। मैं दरवाज़ा खुला छोड़ के गली में खड़ा हो गया। थोड़ी देर बाद मुझे वो लड़के आते दिखे और मैं अपने घर के दरवाज़े पर आ गया। जैसे ही वो घर में दाखिल हुये मैंने तपाक से गेट बन्द किया और हम सब अंदर आ गये।

अंदर आते ही उन्होंने मुझे इम्पोर्टेड चोकलेट का डिब्बा दिया और मुझसे इधर उधर की बातें करने लगे।

इतने में दीदी भी वहाँ आ गई ताकि मुझे लगे कि वो सिर्फ़ दीदी के ही नहीं मेरे भी दोस्त हैं।

उन्होंने मुझसे कहा- हम तेरे दोस्त हैं इसलिये आज के बाद तू किसी से डरना मत, अगर कोई तेरे को तंग करे तो हमको बता देना फ़िर देखना कैसे उसकी पिटाई होती है।

यह सुन कर मुझे अच्छा लगने लगा। फ़िर थोड़ी देर बातें करने के बाद दीदी मुझसे बोली- तू यहाँ पर सो जा, हम मम्मी के कमरे में जा रहे हैं, थोड़ी देर टीवी देखेंगे और बातें करेंगे, फ़िर ये लोग मम्मी के कमरे में सो जायेंगे और मैं सोने के लिये तेरे पास आ जाऊँगी।

मैंने कहा- ठीक है दीदी, पर अगर मुझे अकेले डर लगा तो?
दीदी ने कहा- डर कैसे लगेगा? मैं हूँ ना ! मैं सुलाती हूँ तुझे।

दीदी ने उनको कहा- तुम लोग मम्मी के कमरे में जाकर टीवी देखो, मैं रज्जू को सुला कर आती हूँ।

और फ़िर दीदी मुझे सुलाने लगी। मैं आँखें बंद करके सोने की कोशिश करने लगा पर मुझे नींद नहीं आ रही थी। थोड़ी देर दीदी मुझे थपकियाँ देती रही जब उसे लगा कि मैं सो गया हूँ तो दीदी उठी और मम्मी के कमरे में चली गई। पर मैं अभी सोया नहीं था।

कुछ देर मैं वैसे ही लेटे लेटे सोने की कोशिश करता रहा पर मुझे नींद नहीं आई। अंत में थक-हार कर मैं उठ कर बैठ गया, मैंने सोचा छ्त पर जाकर ठंड में थोड़े चक्कर लगाता हूँ शायद ऐसा करने से नींद आ जाये।

मैं अपने कमरे से निकला और सीढ़ियों की तरफ़ गया। सीढ़ियाँ चढ़ कर जब मैं छत पर गया तो वहाँ बहुत अंधेरा था और धुंध भी बहुत थी। मुझे डर लगने लगा और मैं नीचे आ गया। अब डर के मारे मेरा अपने कमरे में जाने को भी दिल नहीं कर रहा था।

मैंने सोचा कि दीदी के पास जाता हूँ, और मैंने मम्मी के कमरे का दरवाज़ा खटखटाया तो दरवाज़ा खुल गया। मैंने देखा दीदी और वो लड़के दो लड़के बैड की साईड पर बैठे हुये थे, मेरी दीदी बैड पर घोड़ी बनी हुई थी, एक लड़के ने अपना लण्ड पीछे से दीदी के अंदर डाला हुआ था और वो हिल-हिल के अपना लण्ड दीदी के अंदर-बाहर कर रहा था और एक लड़का दीदी के सामने खड़ा था और दीदी उसका लण्ड चूस रही थी और जोर जोर से चीख रही थी।

मुझे देख कर दीदी और वो दोनो लड़के घबरा गये।

मैंने पूछा- यह क्या कर रहे हो आप?

तो उनके कुछ बोलने से पहले दीदी बोली- रज्जू, ये मेरी मदद कर रहे हैं।

मैंने पूछा- कैसी मदद?दीदी बोली- रज्जू हम न, पिल्लो फ़ाईट कर रहे थे, तो मैं फ़ाईट करते-करते बैड से गिर गई और बैड का किनारा मेरे चूतड़ों पर जोर से लग गया और मेरे चूतड़ों के अंदर दर्द होने लगा और ये देख खून भी निकला है। और रज्जू जैसे कभी तेरे गले में दर्द होता है तो पापा उंगली डाल के दबाते हैं ना तो वैसे ही पहले तो ये लोग मेरे चूतड़ों में उंगली डाल कर दबाते रहे पर चूतड़ अंदर से काफ़ी गहरे हैं ना तो इसलिये ये अपनी लम्बी नुन्नी डाल के दबा रहे हैं।

तो मैंने पूछा- दीदी दर्द तुम्हारे चूतड़ों में हुआ है तो ये तुम्हारे मुंह में नुन्नी क्युँ डाल रहा है?

तो दीदी बोली- तू भी पगल है रज्जू, मेरे चूतड़ों में नुन्नी डाल कर दबाने से इसकी नुन्नी दर्द करने लगी थी इसलिये मैंने कहा कि तुम लोग बारी-बारी से मेरे चूतड़ों में नुन्नी डालो और जब नुन्नी दर्द करने लगेगी तो मैं मुंह में डाल कर नुन्नी के दर्द ठीक कर दूँगी। अब तू ही बता दोस्त दूसरे दोस्त की मदद नहीं करते?

मैंने कहा- दीदी, ऐसी बात है तो ठीक है।

फ़िर मैंने कहा- दीदी, मुझे नींद नहीं आ रही और मुझे उस कमरे में अकेले डर लगता है।

तो उन्होंने कहा- यार रज्जू डर लगता है तो यहीं बैठ जा।

और फ़िर मैं भी वहीं बैठ गया। वो लोग बारी-बारी से दीदी की चुदाई करते रहे, कभी लैला दीदी घोड़ी बन कर, कभी खड़े होकर पीछे से, कभी सीधी लेट कर, कभी उलटी लेट कर तो कभी उन लड़कों के ऊपर बैठ के उनके लन्ड अपने अंदर लेती रही।

जब चोदने वाला लड़का अपना लन्ड बाहर निकाल लेता तो दीदी उसका लन्ड मुंह में लेकर चूसने लगती और फ़िर लन्ड से निकले पानी को पी जाती।

मुझे याद है कि मैं दो घंटे तो अपनी बहन का गैंगबैंग होते देखता रहा और फ़िर पता नहीं कब लैला दीदी की चुदाई देखते-देखते मैं सो गया।

ज़ब मैं सुबह जगा तो उस कमरे में कोई नहीं था। मेरे तकिये के पास 100 रुपए रखे हुये थे। मैं समझ गया कि ये मेरे लिये हैं।

मैं उठ कर बाहर आया तो देखा दीदी और वो चारों लड़के नंगे ही हमारे कमरे में बैड पे सो रहे थे।

मैंने दीदी को जगाया। हमने चाय पी, खाना खाया और नहा-धो के तैयार हो गये।

मैंने दीदी से पूछा- दीदी इतना टाईम हो गया, अब ये यहाँ से जायेंगे तो गली में सब को पता चल जायेगा।

तो दीदी बोली- रज्जू मम्मी-पापा और रिम्स तो अभी दो दिन बाद आयेंगे तो हम भी दो दिन स्कूल से छुट्टी मारते हैं और इनको भी यहीं रहने देते हैं।

दीदी ने कहा- रज्जू, वो मुझे बोल रहे थे कि रज्जू बहुत अच्छा लड़का है और वो तुझे 200 रु और देंगे सो तेरी तो चांदी है रज्जू।

मैं यह सुनकर बहुत खुश हुआ। फ़िर अगले दो दिन उन लोगों ने मेरी लैला दीदी की पता नहीं कितनी बार चुदाई की। कभी मेरे सामने तो कभी अकेले में।

तीसरे दिन रात को मम्मी का फोन आया कि वो दिल्ली से चल चुके हैं और सुबह 8 बजे तक घर वापिस पहुँच जायेंगे। फ़िर उस रात वो लड़के दीदी को चोदने के बाद रात को अपने घर चले गये। मैं तो रात को सो गया था।

सुबह दीदी ने मम्मी-पापा के आने से पहले ही मुझे जगा दिया और स्कूल भेज दिया। जब मैं स्कूल से वापिस आया तो मम्मी और रिम्स से मिल के बहुत खुश हुआ।

पापा तो जौब पर गये हुये थे तो दीदी ने मौका मिलते ही मुझे 200 रुपए दिये और मेरे गाल पर प्यारा भैया बोल कर चुम्मा लिया।

तो दोस्तो, इस तरह मेरी मम्मी के लाख ध्यान रखने के बावजूद भी दीदी ने आखिरकार मेरी मदद से अपनी फ़ुद्दी फ़ड़वा ही ली। उस समय तो मुझे नहीं पता था कि वो मेरी दीदी की फ़ुद्दी लेते हैं पर थोड़ा बड़ा होने पर जब मुझे पता चला कि ये कोई दोस्त-वोस्त नहीं बल्कि मेरी दीदी के ठोकू हैं और मैं गिफ़्ट, पैसे और चोकलेट के बदले मेरी दीदी को ठोकने में उनकी मदद करके अन्जाने में अपनी ही दीदी का दलाल बन चुका हूँ।

तब तक अपनी दीदी की चुदाई देखने का चस्का लग चुका था मुझे।

मैं लैला हूँ, पंजाब की रहने वाली हूँ। मेरे भाई के सौजन्य से आप लोग मेरे बारे में सब कुछ जानते हैं तो अपना परिचय ना देते हुए अपनी बात रखती हूँ। कोई भी औलाद चाहे वो लड़का हो या लड़की, अपनी माँ के पेट से शैतान पैदा नहीं होती, इस धरती के लोग और हालात उसको शैतान बना देते हैं। मैं भी ऐसे ही अपने माँ-बाप की दुलारी एक प्यारी सी बेटी थी, मेरा भाई और बहन मुझसे बहुत समय बाद इस धरती पर आये तो बरसों तक मैं माँ-बाप की अकेली संतान थी, घर में सबसे ज्यादा लाड़-दुलार मिलता था, खासकर पापा की तो मैं जान थी। जिंदगी हँसते खेलते बीत रही थी, पापा सरकारी जॉब में थे तो एक दिन पापा ने घर आ कर बताया कि वो सरकारी काम से दूसरे शहर जा रहे हैं दो दिन के लिए।

जिस शहर में पापा को जाना था, उस शहर में पापा की मौसी की बेटी रहती थी, मतलब मेरी बुआ।

बुआ से पापा की बहुत बनती थी और बुआ हर बार फोन पर कहती थी कि कभी लैला को लेकर आओ ! मजे की बात यह थी कि उन दिनों मुझे स्कूल में छुट्टियाँ थी तो पापा ने मुझे साथ लेकर जाने का प्रोग्राम बना लिया।

अगले दिन मैं और पापा चल दिये। हम सीधे बुआ के घर गये। बुआ के घर में मुझे देख के सभी बहुत खुश हुए, खासकर बुआ का बेटा बंटी जो मेरा हमउम्र था।

पापा ने बुआ को बताया कि उनको दो दिन यहाँ रहना है तो सभी बहुत खुश हुये।

चाय-नाश्ता करने के बाद पापा तो अपने काम पर चले गये, मैं और बंटी खेलने में मस्त हो गई। पता ही नहीं चला दोपहर कब हो गई। जुलाई का महीना था तो बुआ ने हमको खाना खिलाने के बाद कहा- बाहर गर्मी बहुत है तो अब तुम दोनों शाम तक कमरे से बाहर नहीं निकलोगे।

मैं और बंटी कमरे में आ गये और बुआ दूसरे कमरे में चली गई यह कह कर कि मैं सोने जा रही हूँ, तुम दोनों खेलो, चाहे सो जाओ पर शाम 6 बजे तक कमरे से बाहर नहीं निकलोगे।

थोड़ी देर तो हम खेलते रहे फिर मैंने कहा- बंटी, मुझे भी नींद आ रही है।

तो बंटी बोला- हाँ लैला, मुझे भी अब नींद आ रही है, चलो थोड़ी देर सो जाते हैं और शाम को फिर खेलेंगे।

तो हम दोनों बिस्तर पर लेट गये। मैं करवट लेकर लेटी थी और बंटी मेरे पीछे लेटा था।

थोड़ी देर बाद बंटी मुझसे बोला- लैला, मैं तेरी गाण्ड ले लूँ?

मुझे पता नहीं था कि गाण्ड लेना किसको कहते हैं, मुझे लगा इसको मेरी कोई चीज पसंद आ गई होगी तो मैंने भोलेपन से कह दिया- हाँ ले लो !

तो बंटी महाशय ने मुझे पीछे से पकड़ लिया और लगे अपनी लुल्ली मेरे चूतडों पर रगड़ने !

पहले तो कपड़े पहने पहने ही, जब मैंने कहा- बंटी तुम तो मेरी गाण्ड लेने वाले थे तो यह क्या कर रहे हो?

तो बंटी बोला- वही तो कोशिश कर रहा हूँ !

मैंने कहा- मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा कि तुम क्या बोल रहे हो।

तो वो मेरे चूतड़ों पर हाथ लगा कर बोला- पागल, यह तेरी गाण्ड है न, यही तो मुझे लेनी है।

मैंने कहा- ठीक है ले लो !

मैं समझ रही थी कि शायद यह भी कोई गेम होगी तो बंटी महाशय ने क्या किया, मेरी स्कर्ट ऊपर की, कच्छी नीचे सरकाई और मेरे चूतड़ नंगे कर दिए। फिर उसने अपनी पैंट नीचे की और अपनी लुल्ली निकाल कर मेरे चूतड़ों की दरार के बीच में रगड़ने लगा।

इससे मुझे थोडा सा अजीब भी लग रहा था और मजा सा भी आ रहा था। कुछ देर लुल्ली मेरी दरार में रगड़ने के बाद वो शांत हो गया और अपनी निक्कर वापिस ऊपर चढ़ा ली।

मैंने पूछा- क्या हुआ?

तो बोला- मैंने तुम्हारी गाण्ड ले ली है, अब तुम भी अपने कपड़े ठीक कर लो।

तो मैंने भी अपनी कच्छी ऊपर कर ली और स्कर्ट नीचे कर ली।

यह सब करके बंटी तो सो गया पर मेरी आँखों से नींद गायब हो चुकी थी, मेरा दिल कर रहा था कि बंटी फिर वो सब करे और करता ही रहे। मैंने बंटी को जगाया और कहा- बंटी, और करो ना !

तो वो बोला- लैला, एक बार में इतनी ही ली जाती है गाण्ड ! अब सो जाओ, शाम को फिर से ले लूँगा।

और बंटी फिर से सो गया पर मुझे नींद नहीं आई, मैं जागती रही और शाम होने का इंतज़ार करती रही।

शाम को बंटी जगा तो मैंने उसको फिर कहा- बंटी, फिर से वो करते हैं ना !

तो वो बोला- चुप कर ! पागल ! मम्मा के सामने न बोल देना कहीं ! वर्ना बहुत मार पड़ेगी।

मुझे समझ तो नहीं आ रहा था कि क्यूँ मार पड़ेगी पर मैं चुप हो गई।

फिर बुआ ने हम दोनों को ठंडा दूध दिया, दूध पीने के बाद बंटी मुझे लेकर छत पर आ गया खेलने के बहाने।

बुआ घर के काम करने लगी। छत पर एक कमरा था पुराना सा, बंटी मुझे उस कमरे में ले गया और मुझे दीवार के सहारे खड़ा कर दिया। पहले उसने मेरी स्कर्ट ऊपर उठा कर मेरी कच्छी नीचे सरकाई और फिर अपनी पैंट नीचे करके अपनी लुल्ली बाहर निकाली और अपनी समझ में मेरी गाण्ड लेने लगा। पता नहीं ऐसा उसने किससे सीखा था या किसी ने उसके साथ किया था…पर मेरे लिए यह नया खेल था जिसमें बहुत मजा आता था।

पर दोनों बार हुआ यह कि जब मुझे मजा आने लगता था तो बंटी बस कर जाता था और मैं तरसती रह जाती थी।

तो मैंने बंटी को कहा- थोड़ी देर और लो न मेरी गाण्ड !

तो वो बोला- लैला, एक बार में इस से ज्यादा मैं नहीं ले सकता।

तो मैंने रूठते हुये उससे कहा- जाओ फिर आगे से मैं तुमको गाण्ड नहीं दूँगी।

तो वो मुझे मनाने लगा।

जब मैं उसके बहुत मनाने पर भी नहीं मानी तो वो बोला- लैला, मेरे दो-तीन दोस्त हैं, तुम मेरे साथ चलो खेलने। फिर मैं और मेरे दोस्त मिल कर तुम्हारी गाण्ड लेंगे।

मैंने कहा- ठीक है, चलो !

तो हम नीचे आ गये। बंटी ने बुआ से कहा- वो और मैं बाहर दोस्तों के साथ खेलने जा रहे हैं।

बुआ ने कहा- ठीक है, पर जल्दी आ जाना।

और बंटी मुझे लेकर अपने तीन दोस्तों के पास गया और उनसे कुछ देर बातें करता रहा और फिर मेरे पास आया, कहने लगा- हमारे पीछे पीछे आ जाओ।

फिर वो मुझे एक खाली पड़े पुराने से खंडहर में ले गये और फिर बारी बारी से मेरे साथ वो खेल खेलने लगे। लगभग आधे घंटे तक दो लड़के और बंटी मेरे साथ वो सब कर चुके थे, जो एक बाकी बचा था वो मेरे पीछे आया और उसने उन लड़कों की तरह मेरी दरार पर लुल्ली नहीं रगड़ी बल्कि अपनी उंगलियों से मेरी दरार को चौड़ा कर दिया फिर अपनी लुल्ली मेरी गाण्ड के छेद में घुसाने लगा।

उसकी लुल्ली मेरे छेद में तो नहीं घुसती थी, उलटे फिसलकर मेरी एक दूसरे से कसी जाँघों के बीच आकर रुक जाती, इससे मुझे और भी ज्यादा मजा मिलने लगा।

फिर थोड़ी देर बाद वो भी थक हार कर रुक गया। फिर मैं और बंटी घर वापिस आ गये। रात को भी हम एक ही बिस्तर पर सोये तो आप समझ ही सकते हैं कि रात को भी वही सब हुआ और फिर अगले दिन दोपहर से पहले फिर से उस खंडहर में बंटी और उन तीन लड़कों ने मेरे साथ किया और दोपहर को सोने से पहले फिर से बंटी ने किया।

शाम को पापा का काम खत्म हो गया और मैं और पापा वापिस घर आने की तैयारी करने लगे।

बंटी ने बहुत कहा कि लैला को थोड़े दिन यही रहने दो, बुआ ने भी कहा पर पापा ने कहा- लैला की छुट्टियाँ कल से खत्म हो रही हैं।

और फिर पापा मुझे लेकर वापिस घर आ गये।

तो यह था लंड की प्यासी लड़की बनने की तरफ मेरा पहला कदम और मुझे इस रास्ते पर ले जाने वाला था मेरा दूर के रिश्ते का भाई !

मेरा सफर जारी रहेगा, मेरे सफर के दर्शक बने रहिएगा…

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